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कभी तो सामने आ बे-लिबास हो कर भी
कभी तो सामने आ बे-लिबास हो कर भी, अभी तो दूर बहुत है तू पास हो कर भी. तेरे गले लगूँ कब तक यूँ एहतियातन मैं, लिपट जा मुझ से कभी बद-हवास हो कर भी. तू एक प्यास है दरिया के भेस में जाना, मगर मैं एक समुंदर हूँ प्यास हो कर भी. तमाम अहल-ए-नज़र…
