Category: कविताई
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बहुत मुश्किल है अब कुछ भी यक़ीनी तौर पर कहना
फ़लक से तोड़कर क़िस्सा ज़मीनी तौर पर कहनाबहुत मुश्किल है अब कुछ भी यक़ीनी तौर पर कहना. किसे चाहें किसे मानें किसे छू लें किसे जानेंये बातें दिल की बातें हैं न दीनी तौर पर कहना. उसे फाज़िल कहो ऐसे हमें जाहिल सुनाई देक़सीदे में ये फ़न है नुक़्ताचीनी तौर पर कहना. मुहब्बत की सलाहीयत…
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हर सरहद को तोड़ ही देगी आज़ादी…
हर सरहद को तोड़ ही देगी आज़ादी दुनिया भर को घर कर देगी आज़ादी. दिल में रह-रह मौज उठेगी आज़ादी जान तो इक दिन लेके रहेगी आज़ादी. जिस्म ये आख़िर गल जाये या जल जाये रूह तो लेकर साथ चलेगी आज़ादी. तिनका तिनका ज़र्रा ज़र्रा जागेगा नींद ढलेगी शब से खुलेगी आज़ादी. चांद तकेगा तारे…
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सब राहों के अन्वेषी बचे-खुचे जंगलों के साथ ही कट गये
अब नहीं हैं प्रणययार्थी, न उनकी गणिकाऐं, वो गदिराए बदन भी नहीं हैं जिनपर लिख सको कामसूत्र जैसा ग्रंथ तुम ज्ञान के लिए यात्राएँ क्यों करोगे जब तुम्हारे हाथ में किताबें हैं जिनमें लिखे हैं यात्राओं के विवरण
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ख़ुदकुशी…भवेश दिलशाद (शाद) की नज़्म
इसी इक मोड़ पर अक्सर गिरा जाता है ऊंचाई से अपनी ज़ात और ख़ाका मिटाया जाता है सब कुछ हो जिसमें ये सिफ़अत, क़ूवत कि जो अपना सके, जो घोल पाये सब कुछ अपने में ग़मे-दिल और ग़मे जानां कहे बिन सह सके जो सब किसी इतनी बड़ी हस्ती के पहलू में किया जाता है…
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हम फिर वापस आएंगे!
फिर से हम जिन्दा लाशें,अपने मरे हुए सपनों से, नाउम्मीदी ओर जिल्लत की जिंदगी सेफिर से हम आपके रुके हुए शहर को चलना सिखाएंगे,फिर से आपकी जिंदगी खुशनुमां बनाएंगे.
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शहरों से ठोकर मिला, हम चल बैठे गांव
माना अपने गांव में, रहता बहुत कलेस। कुल पीड़ा स्वीकार है, ना जाइब परदेस।
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बुर्क़े हटा के आ गयीं, घूंघट उठा के आ गयीं, ये औरतें कमाल..
डर से निजात पा चुकीं, जीने को मरने आ चुकीं, धरने पे मुल्क ला चुकीं, ज़िद इनकी है बहाल, सलाम..
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मिलती मुद्दत में है और पल में हँसी जाती है
आप की याद भी बस आप के ही जैसी है, आ गई यूँही अभी यूँही अभी जाती है।
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नज़्म ‘औरत’: माथे पर लिखी मेरी रुसवाई नहीं जाती
माथे पे लिखी मेरी रुसवाई नहीं जाती… जब भूख लगी तब मैं, या प्यास लगी जब तब मैं हाथ लगी अक्सर, बस मांस लगी जब तब बाक़ी किसी लमहे में, मैं पायी नहीं जाती… या पेट के नीचे मैं या पेट के ठीक ऊपर हस्ती है मेरी इतनी मैं वो हूं जो हूं…
