Category: कविताई
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कविताईः नए बरस की आमद और रद्दी होते कैलेंडर का दर्द
बरस के बीतते इन आखिरी दिनों में/ कैलेंडर की अहमियत घट रही है।
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कविताई: काल के कपाल पर लिखने-मिटाने वाली ‘अटल’ कलम जो हिंदुस्तान का इतिहास भी लिखती है
थाती से कविता मिली और प्रतिभा से सिंहासन। अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के इतिहास के कभी न मिट सकने वाले अध्याय हैं। राजनैतिक विश्व के इस त्रिभुजाकार भूगोल पर उनके जीवन का बहुकोणीय हस्तक्षेप उनके नाम की तरह ही अटल है। इमरजेंसी की पीड़ा, जनता पार्टी का गठन और उसके बाद उनकी सार्वजनिक जिंदगी…
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जन्मदिनः ‘मैं जो हूं जॉन एलिया हूं जनाब, इसका बेहद लिहाज कीजिएगा’ – जॉन एलिया
हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाजे बयां और जिन लोगों ने जॉन एलिया को मंचों पर शेर पढ़ते सुना है वो गालिब के इस शेर का प्रायोगिक प्रस्तुतिकरण महसूस करते होंगे। इस शेर में गालिब की जगह जॉन लिख देने के बाद सिर्फ शेर की बहर…
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पुण्यतिथिः शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है – मैथिलीशरण गुप्त
यह रिवर्स टैलेंट का दौर है,जब संघर्षों की आवश्यक प्रक्रियाएं रोचक कहानियों के आवरण में सहानुभूतिक शब्दों के टैगलाइन के साथ बेची जा रही हैं, निहित स्वार्थों के लिए। ऐसे में साहित्य के घोषित उद्देश्यों के अधीन गुप्त जी की इस कविता के माध्यम से अपने देश के किसानों और किसानी को महसूस कीजिए। गुप्तजी…
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जहाँ हक माँगना मजलूम की फरियाद लगती है
बता दे ये जमीं कैसे तुझे आजाद लगती है जहाँ हक माँगना मजलूम की फरियाद लगती है। कि जिनको है चुना हमने हमारी सरपरस्ती को हमें उनकी ही नियत अब बडी नाशाद लगती है । है जिसके आँखों पे पट्टी, कि जो इन्साफ करती है वो देवी अब मुझे धृतराष्ट्र की औलाद लगती है। परिंदा…
