जन्मदिनः ‘मैं जो हूं जॉन एलिया हूं जनाब, इसका बेहद लिहाज कीजिएगा’ – जॉन एलिया

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाजे बयां और

जिन लोगों ने जॉन एलिया को मंचों पर शेर पढ़ते सुना है वो गालिब के इस शेर का प्रायोगिक प्रस्तुतिकरण महसूस करते होंगे। इस शेर में गालिब की जगह जॉन लिख देने के बाद सिर्फ शेर की बहर ही गलत होगी बाकी उसके अर्थ और भाव पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अलमस्त फकीर जैसा जीवन जीने वाले जॉन एलिया की शायरी सोशल मीडिया के अस दौर में बेहद लोकप्रिय है। दिल जुड़ने, टूटने, बरबाद होने और कहीं नजर मिलने का जो जश्न और सोग है उसकी महक में आजकल जॉन एलिया ही रचे-बसे हैं। 14 दिसंबर 1931 को अमरोहा में पैदा हुए जॉन बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले तो गए लेकिन उनकी मोहब्बत ताउम्र हिंदुस्तान ही बना रहा। सत्तर के दशक में जब एक मुशायरे के सिलसिले में जॉन हिंदुस्तान आए थे तब उन्हें पाकिस्तानी शायर कहकर मंच से पुकारा गया। जॉन इस पुकार से बहुत आहत हुए थे और मंच पर आते ही खुद के हमेशा के लिए हिंदुस्तानी होने की घोषणा कर दी थी। पत्रकार जाहिदा हिना से इंशा पत्रिका के निकालने के दौरान हुई मुलाकात मोहब्बत के रास्ते शादी तक पहुंची लेकिन उसका अंत दुखद हुआ। 1984 में दोनों का तलाक हो गया।

जॉन एलिया खुद को ही खारिज करने वाले अजीबोगरीब शख्सियत थे। मंचों पर नशे में धुत्त जॉन खुद को मेंटल घोषित करते। अपनी शायरी को खुद ही खारिज कर देते। ये बात वह खुद कहते हैं कि ‘अपनी शायरी का जितना मुंकिर मैं हूं, उतना मुंकिर मेरा कोई बदतरीन दुश्मन भी न होगा। कभी कभी तो मुझे अपनी शायरी बुरी, बेतुकी, लगती है इसलिए अब तक मेरा कोई मज्मूआ शाये नहीं हुआ और जब तक खुदा ही शाये नहीं कराएगा, उस वक्त तक शाये होगा भी नहीं।’ यहां मुंकिर का मतलब खारिज करने वाला है। मज्मुए यानी कि रचनाएं तो उनकी ‘यानी’, ‘गुमान’, ‘लेकिन’, ‘गोया’ नाम से छपीं और हाथों-हाथ बिकीं लेकिन इन किताबों का मसौदा तैयार करने के लिए जॉन से ज्यादा मेहनत उनके दोस्तों और हमशायरों को करनी पड़ी जिन्होंने इन मज्मुओं को अंजाम देने के लिए जॉन से लगभग चिरौरी की थी।

जॉन एलिया के कुछ लोकप्रिय शेर प्रस्तुत हैं –

कितने ऐश उड़ाते होंगे कितने इतराते होंगे,
जाने कैसे लोग होंगे जो उसको भाते होंगे।

यारो कुछ तो जिक्र करो तुम उसकी क़यामत बाहों का,
वो जो सिमटते होंगे उनमे वो तो मर जाते होंगे।
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सौजन्य सेः रेख्ता

शर्म, दहशत, झिझक, परेशानी..नाज़ से काम क्यों नहीं लेतीं
आप.. वो.. जी.. मगर.. वो सब क्या है तुम मेरा नाम क्यों नहीं लेतीं।

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हालत-ए-हाल के सबब हालत-ए-हाल ही गई,
शौक़ में कुछ नहीं गया शौक़ की ज़िंदगी गई।

एक ही हादसा तो है और वो यह के आज तक,
बात नहीं कही गई बात नहीं सुनी गई।


अब जो रिश्तों में बँधा हूँ तो खुला है मुझ पर,
कब परिंद उड़ नहीं पाते हैं परों के होते।

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बहुत नज़दीक आती जा रही हो,
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या।

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इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊँ,
वगरना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैं ने।


कौन इस घर की देख-भाल करे,
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है।

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जिंदगी क्या है इक हुनर करना
सो, करीने से ज़हर पीजिएगा।

मैं जो हूं जॉन एलिया हूं जनाब
इसका बेहद लिहाज कीजिएगा।

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