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    खबरगांव चैनल का मालिक कौन है, कहां से चलता है?

    इंटरनेट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, खबरगांव एक चैनल है। इसका एक यूट्यूब चैनल और एक वेबसाइट भी है और फेसबुक, इंस्टाग्राम पर भी है। यूट्यूब पर इसके वीडियो खूब देखे जाते हैं और लाखों फॉलोवर भी हैं। इसकी वेबसाइट पर अलग-अलग तरह के विश्लेषण छापे जाते हैं। यूट्यूब पर इस चैनल की तुलना लल्लनटॉप से होती है। एक सोशल मीडिया पोस्ट के मुताबिक कई पत्रकार लल्लनटॉप छोड़कर खबरगांव में शामिल हुए हैं।

    खबरगांव के एडिटर इन चीफ प्रवीण पांडेय हैं। हरियाणा के पंचकूला की एक कंपनी TIF मल्टिमीडिया प्राइवेट लिमिटेड खबरगांव की मालिक है। धैर्य के. और भूपेंद्र सोनी इस कंपनी के फाउंडर हैं और नितिन नारंग इस कंपनी के फाउंडर हैं। नितिन नारंग चेस फेडरेशन के अध्यक्ष भी हैं और कई अन्य कंपनियों के भी मालिक हैं। इस कंपनी के CEO धैर्य के. हैं।

    कितने हैं फॉलोवर?

    Youtube पर इस चैनल के 4 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं। लल्लनटॉप में काम कर चुके निखिल वथ, कमल भट्ट, गौरव पांडे, आस्था राठौर आदि अब खबरगांव के लिए काम करते हैं। शायद यही वजह है कि इन दोनों चैनलों की तुलना भी की जाती है। पिछले दिनों खबरगांव चैनल पर पंचायत वेब सीरीज के सचिव जी का इंटरव्यू भी आया था।

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    हर चुनाव नहीं जिताता फ्री बिजली का वादा, पढ़िए कब-कब हार मिली

    Bihar CM Nitish Kumar

    बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चुनावों से ठीक पहले ऐलान किया है कि राज्य के लोगों को 125 यूनिट तक फ्री बिजली मिलेगी। बिहार सरकार की इस योजना का लाभ राज्य के करीब 1 करोड़ 67 लाख परिवारों को मिलेगा। नीतीश कुमार का कहना है कि बिहार की एक बड़ी आबादी, 125 यूनिट से कम बिजली खर्च करती है। उन्होंने यह भी ऐलान किया है कि आने वाले तीन वर्षों में इन सभी घरेलू उपभोक्ताओं से सहमति लेकर उनके घर की छतों पर या नजदीकी सार्वजनिक स्थल पर सोलर एनर्जी के जरिए बिजली पहुंचाई जाएगी। चुनावों से पहले ऐसे ऐलान देश की राजनीति में अब चौंकाते नहीं हैं। आम आदमी पार्टी (AAP) ने पहली बार ऐसी मुफ्त की योजनाओं को लेकर आई थी, दिल्ली में 300 यूनिट फ्री बिजली का वादा किया था, तब से लेकर अब तक, हर चुनावी राज्य में इस वादे को दोहराया जाता है।

    अरविंद केजरीवाल का यह मॉडल दिल्ली और पंजाब में हिट साबित हुआ था, जिसके बाद राजनीतिक पार्टियां, एक से बढ़कर एक ‘मुफ्त की योजनाओं’ का एलान करने लगीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक चुनावी जनसभा में इन वादों को ‘मुफ्त की रेवड़ियां’ कहा। अलग बात है कि आने वाले कई चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने भी ऐसी योजनाओं का खूब जिक्र किया।

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    मुफ्त की योजनाओं की सियासत, कई राज्यों में चर्चा में रहीं। निम्न और मध्यम वर्ग के वोटरों ने इन योजनाओं पर भरोसा किया। दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी (AAP) के उभार में राजनीतिक विश्लेषक इन योजनाओं का भी हाथ मानते हैं लेकिन ऐसा कई बार हुआ, जब ये योजनाएं मतदाताओं को लुभा नहीं पाईं। मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने इस मॉडल को अपनाने की कोशिश की लेकिन ज्यादा लाभ नहीं हो पाया। यह मॉडल कर्नाटक में तो हिट रहा लेकिन कई राज्यों में फ्लॉप हुआ। एक बात यह पता चली कि मुफ्त की योजनाएं, अकेले जीत की गारंटी नहीं हैं।

    दिल्ली का मॉडल, जीत की गारंटी बन गया था

    दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने साल 2015 में 200 यूनिट तक फ्री बिजली देने का वादा किया था। 201 से लेकर 400 यूनिट पर छूट देने का वादा किया गया। चुनावी नतीजे हैरान करने वाले रहे। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 67 सीटों पर जीत हासिल की। कांग्रेस का खाता नहीं खुला और भारतीय जनता पार्टी के खाते में सिर्फ 3 सीटें आईं। वह भी तब, जब नरेंद्र मोदी प्रचंड बहुमत से देश में सत्ता में आए थे। ऐसा जनादेश दशकों बात मिला था।

    बाकी राज्यों में आलोचना लेकिन दिल्ली में फिर छा गया फ्री मॉडल

    जब अरविंद केजरीवाल ने फ्री बिजली की नीति का ऐलान किया तो उनकी खूब आलोचना हुई। विपक्षी पार्टियों ने अरविंद केजरीवाल की इस नीति की खूब आलोचना की। दिल्ली की फ्री बिजली, फ्री पानी, फ्री बस यात्रा का खूब विरोध किया। जनसभाओं से कहा गया कि अरविंद केजरीवाल लोकलुभावन वादे करके जनता को गुमराह कर रहे हैं और सरकार का खजाना खाली कर रहे हैं। अरविंद केजरीवाल ने फिर साल 2020 के विधानसभा चुनावों में फ्री बिजली देने का ऐलान किया।

    2020 के विधानसभा में दिल्ली का फ्री मॉडल कितना हिट रहा

    साल 2020 में दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए। आम आदमी पार्टी ने 62 सीटें हासिल कीं। मुफ्त बिजली का असर वोटों में बदलता नजर आया। बिहार के ज्यादातर सर्वे में कहा गया कि मुफ्त बिजली से उन्हें राहत मिली है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे भी छाए रहे। कांग्रेस ने 300 यूनिट तक फ्री बिजली देने का वादा किया था लेकिन उन पर AAP का वादा भारी पड़ा और दूसरी बार फी प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई। बीजेपी ने 8 सीटें जीतीं तो कांग्रेस हाशिए पर रही।

    यह भी पढ़ें- क्या जाति से आगे नहीं बढ़ पाएगी उत्तर प्रदेश की राजनीति?

    फ्री बिजली का पंजाब मॉडल

    अरविंद केजरीवाल ने की मुफ्त की योजनाओं का असर पंजाब में दिखा। साल 2022 में पंजाब में विधानसभा चुनाव हुए। किसान आंदोलन की वजह से बीजेपी ने पंजाब में अपना रहा-सहा जनाधार भी खो दिया। कैप्टन अमरिंदर ने कांग्रेस से किनारा कर लिया था, जिसके बाद कांग्रेस का जनाधार भी कम हुआ, कैप्टन भी अपनी सीट नहीं बचा पाए। वजह थी कि मुफ्त की योजनाओं वाली कांग्रेस वहां छा गई थी। AAP सरकार चुनावी वादा करके आई थी कि अगर सरकार बनी तो 300 यूनिट तक फ्री बिजली दी जाएगी। पंजाब में 117 विधानसभा सीटों पर वोट पड़े, 92 पर AAP ने जीत दर्ज की। पंजाब में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों ने भी AAP की मदद की। चुनाव AAP के खाते में गया, भगवंत मान मुख्यमंत्री बने।

    कहां-कहां फ्लॉप हुआ ‘फ्री बिजली’ का फंडा

    राजस्थान: साल 2023 में विधानसभा चुनाव हुए। कांग्रेस की तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा कि सरकार 100 यूनिट तक मुफ्त बिजली देगी। 200 यूनिट तक बिजली खर्च करने पर सब्सिडी दी जाएगी। कांग्रेस के इस वादे पर जनता ने भरोसा नहीं किया। राज्य की 200 विधानसभा सीटों में कांग्रेस ने 69 सीटों पर जीत हासिल की लेकिन बहुमत से दूर रही। बीजेपी 115 सीटों के साथ बहुमत का आंकड़ा छू लिया। कांग्रेस के मुफ्त के वादे पर जनता ने यकीन नहीं किया। अलग बात है कि अब बीजेपी ने 150 यूनिट तक गरीब परिवारों के लिए मुफ्त की बिजली देने का ऐलान किया है।
    नतीजा क्या हुआ: अशोक गहलोत के मुफ्त के वादे की जगह जनता ने बीजेपी पर भरोसा जताया। मुफ्त की बिजली जीत की गारंटी नहीं बन सकी।

    कर्नाटक: साल 2023 में विधानसभा चुनाव हुए। कांग्रेस ने 200 यूनिट तक फ्री बिजली देने का वादा किया। सत्ता में आते ही कांग्रेस ने इसे लागू किया। कांग्रेस ने राज्य की 225 विधानसभा सीटों में से 135 सीटों पर जीत हासिल की। कांग्रेस की गृह ज्योति, अन्न भाग्य, सखी कार्यक्रम, युवा निधि और गृह लक्ष्मी जैसी योजनाओं पर लोगों ने भरोसा किया।
    नतीजा क्या हुआ: बीजेपी के हाथ सत्ता निकल गई। मुफ्त का चुनावी एजेंडा हिट हो गया। अलग बात है कि बीजेपी की इस हार के पीछे पार्टी के भीतरी कलह को भी सियासी जानकारों ने जिम्मेदार ठहराया।

    झारखंड: झारखंड में साल 2024 में विधानसभा चुनाव हुए। झारखंड मुक्ति मोर्चा सरकार ने वादा किया कि राज्य के लोगों को 200 यूनिट तक मिलने वाली मुफ्त बिजली जारी रहेगी। भारतीय जनता पार्टी ने और बढ़कर 300 यूनिट फ्री बिजली देने का वादा कर दिया। झारखंड में 81 विधानसभा सीटें हैं। 34 विधानसभा सीटों पर झारखंड मुक्ति मोर्चा को हासिल हुईं, कांग्रेस को 16 सीटें मिलीं, 21 सीटों पर बीजेपी जीती। राष्ट्रीय जनता दल सिर्फ 4 सीटें जीत पाईं।

    नतीजा क्या हुआ: बीजेपी का वादा झारखंड में एक बार फिर फ्लॉप हुआ। साल 2019 की तरह यहां की सत्ता से एक बार फिर बीजेपी दूर ही रही।

    मध्य प्रदेश: राज्य की 230 विधानसभा सीटों पर साल 2023 में चुनाव हुए। कांग्रेस ने वादा किया था कि लोगों को 100 यूनिट तक बिजली दी जाएगी, 200 यूनिट तक सस्ती दरों पर बिजली दी जाएगी। इसके उलट बीजेपी ने वादा किया था कि 100 रुपये में 100 यूनिट बिजली दी जाएगी। बीजेपी के वादे पर लोगों ने भरोसा जताया।
    नतीजा क्या हुआ: बीजेपी ने 163 सीटों पर जीत हासिल की। कांग्रेस महज 66 सीटों पर सिमट गई।

  • आर जी कर अस्पताल से सुप्रीम कोर्ट तक, अब तक क्या-क्या हुआ?

    Kolkata Case

    पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित आर जी (राधा गोविंद) कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का नाम इन दिनों पूरे देश की जुबान पर है. इसकी वजह बलात्कार और हत्या का एक केस है जिसने आम जनमानस को हिलाकर रख दिया है. आर जी कर अस्पताल में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही 31 वर्षीय ट्रेनी डॉक्टर की क्षत-विक्षत लाश 9 अगस्त को अस्पताल के सेमिनार हॉल में मिली. तब से अब तक यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच चुका है. इस मुद्दे पर एक तरफ जहां देश के आम लोगों का गुस्सा सामने आ रहा है तो अलग-अलग पार्टियों के नेता जमकर राजनीति भी कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी पुलिस और राज्य सरकार की भूमिका को लेकर सख्त टिप्पणियां की हैं. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से कहा है कि वह इस मामले की स्टेटस रिपोर्ट 22 अगस्त तक जमा करे. वहीं, अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित डॉक्टर देशभर में हड़ताल कर रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए.

    पुलिस ने घटना के अगले ही दिन संजय रॉय नाम के शख्स को गिरफ्तार किया, जिस पर पहले भी महिला विरोधी गतिविधियों के आरोप लगते रहे हैं. कहा जा रहा है कि वह अस्पताल में मरीजों के काम करने वाले के बदले पैसे लेता था.पीड़िता की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी सामने आ चुकी है. सूत्रों के मुताबिक, इस रिपोर्ट में पीड़िता के शरीर पर गहरी चोटों के निशान हैं जो रेप की पुष्टि करते हैं. वहीं, पीड़िता के परिजन लगातार दावा कर रहे हैं कि यह मामला रेप का नहीं बल्कि गैंगरेप का है. हालांकि, अभी तक गैंगरेप की पुष्टि नहीं की गई है.

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    सीबीआई कर रही है जांच

    इस केस में सबसे ज्यादा हंगामा अस्पताल की भूमिका को लेकर हुआ. आरोप हैं कि मेडिकल कॉलेज की ओर से पीड़िता के परिजन को बताया गया कि उनकी बेटी ने आत्महत्या कर ली है. 12 अगस्त को आर जी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के प्रिंसिपल डॉ. संदीप घोष ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. मामला बढ़ता देखकर कलकत्ता हाई कोर्ट ने 14 अगस्त को इस केस की जांच सीबीआई को सौंप दी. पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष भी सीबाई की हिरासत में हैं और उनसे पूछताछ कर रही है.

    हाई कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई अपनी जांच शुरू कर पाती, उससे पहले ही 14-15 अगस्त की दरम्यानी रात एक बड़ी भीड़ आर जी मेडिकल कॉलेज में घुसी और जमकर तोड़फोड़ की. इसको लेकर पुलिस पर भी सवाल उठे कि आखिर इतने संवेदनशील मुद्दे पर भी वह कुछ कर क्यों नहीं पाई? सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो भी आए जिनमें मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर अपनी सुरक्षा की गुहार लगाते रहे. पीड़िता के परिजन न्याय की मांग करते हुए ममता बनर्जी की अगुवाई वाली राज्य सरकार को भी कठघरे में खड़ा कर रहे हैं. साइकोलॉजिकल टेस्ट के बाद अब आरोपी के पॉलीग्राफी टेस्ट की तैयारी की जा रही है ताकि सच सामने लाया जा सके.

    यह भी पढ़ें- शाम ढलने के बाद महिलाओं की गिरफ्तारी क्यों नहीं होती?

    आर जी कर पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

    इस पूरे मामले में कॉलेज के प्रिंसिपल रहे संदीप घोष के बयानों में लगातार बदलाव होने की वजह से उनसे भी सीबीआई की टीम पूछताछ कर रही है. राज्य का घटना के चलते ममता बनर्जी की सरकार चौतरफा निशाने पर है. वहीं, ममता बनर्जी सीबीआई से अपील कर रही हैं कि वह जल्द से जल्द केस के आरोपी को सजा दिलाए.

    इस सबके बीच डॉक्टर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं जिसके चलते देशभर के कई अस्पतालों में ओपीडी सेवाएं तक प्रभावित हो रही हैं. डॉक्टरों के संगठन फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स असोसिएशन (FORDA) ने फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर खुशी जताई है जिसमें चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने आधेश दिए हैं कि एक नेशल टास्क फोर्स बनाई जाए ताकि हेल्थकेयर वर्कर्स को सुरक्षा दी जा सके. हालांकि, अभी तक डॉक्टरों की हड़ताल खत्म नहीं हुई है सुरक्षा को लेकर उनकी चिंताएं और सवाल वैसे के वैसे बने हुए हैं.

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    उत्तराखंड की लोकसभा सीटों पर कौन लड़ रहा है चुनाव?

    Uttarakhand Loksabha seats

    2014 और 2019 में उत्तराखंड की पांचों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) को जीत मिली है. लगातार चुनाव हार रही कांग्रेस तमाम कोशिशों के बावजूद वापसी नहीं कर पा रही है. बीते विधानसभा चुनावों में भी वह छाप नहीं छोड़ पाई और बीजेपी ने एक बार फिर से सरकार बना ली. बीजेपी ने इस बार कुछ सीटों पर अपने उम्मीदवार बदले भी हैं.

    यह भी पढ़ें- Delhi Lok Sabha Seats: दिल्ली की 7 सीटों पर कौन लड़ रहा है चुनाव?

    कांग्रेस के लिए मुश्किल यह है कि उसके पास मजबूत उम्मीदवार ही नहीं हैं. यही वजह है कि तमाम सर्वे में उत्तराखंड की सभी सीटों पर बीजेपी जीतती दिख रही है.

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    लोकसभा सीटBJPकांग्रेसमौजूदा सांसद
    नैनीताल-ऊधम सिंह नगरअजय भट्टअजय भट्ट
    अल्मोड़ाअजय टम्टाप्रदीप टम्टाअजय टम्टा
    हरिद्वारत्रिवेंद्र सिंह रावतरमेश पोखरियाल निशंक
    टिहरी गढ़वालमाला राज्य लक्ष्मी शाहजोत सिंह गुनसोलामाला राज्य लक्ष्मी शाह
    पौड़ी गढ़वालअनिल बलूनीगणेश गोदियालतीरथ सिंह रावत
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    Delhi Lok Sabha Seats: दिल्ली की 7 सीटों पर कौन लड़ रहा है चुनाव?

    kejriwal vs modi

    दिल्ली की 7 लोकसभा सीटों पर इस बार चुनाव रोमांचक हो गया है. धुर-विरोधी कही जाने वाली कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) ने हाथ मिला लिया है. इसी को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने 6 मौजूदा सांसदों के टिकट काट दिए हैं और सिर्फ मनोज तिवारी को ही लगातार तीसरी बार टिकट मिल पाया है.

    आइए देखते हैं कि दिल्ली की किस सीट से किसे टिकट मिला है?

    लोकसभा सीटBJPINDIA (Congress/AAP)मौजूदा सांसद
    चांदनी चौकप्रवीण खंडेलवालडॉ. हर्षवर्धन (BJP)
    नॉर्थ ईस्ट दिल्लीमनोज तिवारीमनोज तिवारी (BJP)
    पूर्वी दिल्लीहर्ष मल्होत्राकुलदीप कुमार (AAP)गौतम गंभीर (BJP)
    नई दिल्लीबांसुरी स्वराजसोमनाथ भारती (AAP)मीनाक्षी लेखी (BJP)
    दक्षिणी दिल्लीरामवीर बिधूड़ीसहीराम पहलवान (AAP)रमेश बिधूड़ी (BJP)
    पश्चिमी दिल्लीकमलजीत सहरावतमहाबल मिश्रा (AAP)प्रवेश वर्मा (BJP)
    नॉर्थ वेस्ट दिल्लीयोगेंद्र चंदोलियाहंसराज हंस (BJP)
  • तुम ठाकुर, मैं पंडित, ये लाला, वो चमार फिर महाब्राह्मण कौन?

    book review mahabrahman

    किताब- महाब्राह्मण (उपन्यास)
    लेखक- त्रिलोकनाथ पांडेय
    समीक्षक- गोविंदा प्रजापति

    ‘तुम ठाकुर, मैं पंडित, ये लाला और वो चमार!’ भारतीय समाज की संरचना में ‘जाति’ किसी बड़े कंकड़ जैसा है. स्वादिष्ट बिरयानी की मौज उड़ाते हुए जब यह कंकड़ अचानक दांतों के बीच में पड़ता है, तब भयानक दर्द के साथ मुंह से निकलता है- ‘अरे ये क्या था?’

    कंकड़ की चोट से उठने वाला दर्द उन लोगों को महसूस हुआ जो इस व्यवस्था के कारण शोषण का शिकार हुए और उन्हें लगता है कि उनके हिस्से में सिर्फ कंकड़-पत्थर ही परोसा गया. बाकी लोगों के लिए बिरयानी की मौज तो सदियों से बरकरार ही है. हालांकि, जाति व्यवस्था का ये क्रम आगे चलकर उपजातियों में बंट जाता है और तब हजारी प्रसाद द्विवेदी की एक लाइन याद आती है. वो कहते हैं कि, ‘हिन्दू समाज में नीची से नीची समझे जाने वाली जाति भी अपने से नीची एक और जाति ढूंढ लेती है.’

    हाल ही में मैंने त्रिलोकनाथ पांडे जी का लिखा हुआ एक उपन्यास पढ़ा, जिसका शीर्षक है ‘महाब्राह्मण’. इस किताब को पढ़ते हुए गुस्ताखी के साथ मुझे महसूस हुआ कि द्विवेदी जी की इस लाइन को रिवर्स ले जाने की भी जरूरत है. जाति व्यवस्था के क्रम में ऐसी धारणा है कि सभी ब्राह्मण सबसे ऊपर ही होते हैं और उनके हिस्से में सिर्फ स्वादिष्ट बिरयानी ही है जिसका जिक्र अभी हमने किया था. इसी ब्राह्मण समाज में एक उपजाति है जिसे नाम दिया गया है ‘महाब्राह्मण’. कई जगहों पर इन्हें कंटहा, महाबाभन और आचारज भी कहा जाता है.

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    इस शब्द को सुनने के बाद कई लोगों के मन में सवाल होगा कि ‘महाब्राह्मण’ कौन होते हैं? क्या काम करते हैं? कहां रहते हैं? और इनका जीवन कैसा होता है? त्रिलोकनाथ पांडे जी का उपन्यास अकेले आपके सभी सवालों का जवाब देने में सक्षम है. क्या है इस किताब में? कहते हैं कि जाति भारतीय समाज का कड़वा सच है लेकिन इस उपन्यास को पढ़ने के बाद लगा कि उपजाति इस कड़वेपन से भी ज्यादा कसैला है.

    पूर्वी उत्तर प्रदेश की जमीन पर गढ़ी गई ‘महाब्राह्मण’ की कहानी त्रिभुवन नारायण मिश्रा के इर्द-गिर्द घूमती है जिसकी उपजाति भी यही शीर्षक यानी महाब्राह्मण है और उसके जीवन का अभिशाप भी यही है. महाब्राह्मण शब्द सुनते ही त्रिभुवन को गालियों की संज्ञा से नवाज दिया जाता है. उसकी परछाई भी किसी के लिए अछूत हो जाती है और उसका छुआ हुआ मानो किसी जहर में तब्दील हो जाता है जिसे फेंक कर गंगाजल छिड़कने की नौबत आ जाती है. बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में तेज त्रिभुवन के जीवन ऐसे कई पल आते हैं, जिसे महसूस करके पाठकों का गला भर आएगा.

    यह भी पढ़ें- फांसी की सजा सुबह ही क्यों दी जाती है?

    गरीबी में पालने में पैदा हुआ त्रिभुवन कड़ी मेहनत के बल पर बीएचयू पहुंचता है लेकिन विश्वविद्यालय का टॉपर होकर भी उसे एक प्रोफेसर के आतंक से पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ती है. इसके बाद दुखों का पहाड़ उठाते हुए इलाहाबाद की यात्रा होती है. जहां दिन-रात एक करने के बाद त्रिभुवन बनता है IPS त्रिभुवन नारायण मिश्रा! लेकिन क्या गरीबी और लाचारी का दंश झेलते हुए यूपीएससी की परीक्षा पास करना ही जीत की असली परिभाषा है या इससे बड़ा भी कोई दुख है? उपन्यास पढ़कर आप समझेंगे कि ऊंची पदवी पर बैठे शख्स के दर्द भी बड़े होते हैं. लेखक की मेहनत जाया न हो लिहाजा हम स्पॉयलर नहीं देंगे. आपको सभी सवालों का जवाब जानने के लिए ‘महाब्राह्मण’ पढ़ना होगा.

    क्या है उपन्यास की खास बात?
    ‘महाब्राह्मण’ में भारतीय समाज का वो कड़वा सच निकलकर आता है जिससे अब तक हम अनजान हैं या अनजान बनने का नाटक करते हैं! मैंने पहली बार ऐसी कोई किताब पढ़ी है जो ब्राह्मण समाज के उस वर्ग पर बात करती है जिनकी स्थिति बेहद दयनीय है. जिनके पास न पैसा है, न ही सम्मान है और न ही ज्ञान है. हमारा समाज गुरुओं को भगवान का दर्जा देता है लेकिन यह उपन्यास बताता है कि कैसे विश्वविद्यालय में कोई छात्र किसी विशेष जाति की वजह से गुरु का प्रिय हो जाता है या कैसे कोई लड़का घृणा का भागीदार बन जाता है?

    सामाजिक ढांचे की कमियां कैसे राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल की जाती हैं. यह उपन्यास बखूबी बताता है. अंग्रेजी का ‘विलेज’ भारतीय गांवों से कैसे अलग है. इन गांवों के बसने की संरचना क्या होती है? यह त्रिलोक जी के उपन्यास से समझा जा सकता है. यहां आपकी मुलाकात कई तरह के किरदारों से होगी- एक जो दुख देते हैं, दूसरे जो दर्द सहते हैं और तीसरे जो उम्मीद की किरण बनकर आते हैं. त्रिभुवन इन्हीं सबसे घिरा रहता है और कहानी आपको एक रोमांचक और मार्मिक सफर पर ले जाती है. इतना ही नहीं यह आपकी समझ में भी इजाफा करने का काम करती है.

    कैसी है भाषा शैली?
    त्रिलोकनाथ पांडे जी की भाषा आम बोलचाल की है. लेखक को एक प्रवाह के साथ कहानी कहने में महारत हासिल है. शब्दों के विशाल भंडार के साथ उनके पास अपनी हर एक बात का तर्क मौजूद है जिसे वो पूरी तरह से जस्टिफाई भी करते हैं. कहानी के रोमांच का ग्राफ कई बार ऊपर-नीचे हो जाता है लेकिन विषय का चुनाव आपको एक बार में उपन्यास पढ़ने को मजबूर करता है. कई बार कहानी हाथ से छूटती है और लगता है कि अंत थोड़ा और कसा हुआ किया जा सकता था लेकिन इन सबके बावजूद भी ‘महाब्राह्मण’ पैसा वसूल परफॉर्मेंस देते हुए एक बेहतरीन उपन्यास साबित होती है.


    (गोविंदा प्रजापति)

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    पनामा नहर: 26 मीटर ऊपर उठा दिए जाते हैं पानी के जहाज

    panam canal

    क्या आप सोच सकते हैं कि लाखों टन वजन वाले पानी के जहाजों को सिर्फ पानी के दम पर लगभग 25 मीटर ऊपर उठा दिया जाए.  पनामा कैनाल यानी पनामा नहर. लमसम 80 किलोमीटर लंबी इस नहर को बनाने का आइडिया 15वीं शताब्दी में आया. लेकिन बीमारी, गरीबी, टेक्नॉलजी की परेशानी और तमाम दुविधाओं के बाद इसका काम पूरा हुआ 1914 में. उसके बाद से ही यह दुनिया की पहली ऐसी नहर बन गई है, जो अपनी टेक्नॉलजी के लिए जानी जाती है.

    गाटुन झील में बना है ये गेट

    दरअसल, प्रशांत महासागर और उत्तरी अटलांटिक महासागर (कैरेबियन सी) को जोड़ने वाली ये नहर गाटुन (Gatun) झील से होकर गुजरती है. यही झील ही इस नहर के रास्ते को बेहद खास बनाती है. प्राचीन काल में जब ये नहर नहीं बनी थी तो पूर्वी अमेरिका से पश्चिमी अमेरिका, या यूरोप से पश्चिमी अमेरिका जाने के लिए लगभग 12679 किलोमीटर का एक्स्ट्रा रास्ता तय करना पड़ता था.

    तो उस समय के तिकड़म बाजों ने दिमाग लगाया कि यार दोनों तरफ समुद्र है, बीच में झील. हर तरफ पानी है ही तो क्यों ने इसी में से निकल जाया जाए. अब ये कोई मोटरबोट तो है नहीं कि लेकर भुर्रर से निकल जाओगे. इसके लिए लगता है पूरा इंजीनियरिंग.

    इसे भी पढ़ें- शेयर मार्केट में बुल ऐंड बेयर का क्या मतलब होता है?

    26 मीटर का है ऊंचाई में अंतर

    दिक्कत ये थी कि गाटुन झील प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर से 26 मीटर ऊंची है. मतलब लगभग आठ मंजिला बिल्डिंग जितनी ऊंचाई पर. हो गया न काम. अब सोचो कि जाना कैसे है. रास्ता ऐसा है कि एक तरफ प्रशातं महासागर, बीच में गाटुन झील जो कि 26 मीटर ऊंचाई पर है और दूसरी तरफ अटलांटिक. अब पानी का जहाज सीढ़ी लगाकर तो चढ़ नहीं सकता. लेकिन बी. टेक वालों के अंदर होता है बहुत ज्यादा कीड़ा. इन्होंने कहा, ऐसे कैसे नहीं जा सकते है. तो प्लान बना सीढ़ी ही बना लेने का. ये जो सीढ़ी बनाई गई है. यही अपने आप में इंजीनियर्स की बहुत बड़ी कामयाबी है. 

    पहले तो नहर खोदी गई. इस पार से उस पार मामला क्लियर. फिर जहां से गेट बनाए गए. वहां तो पानी का स्तर 26 मीटर ऊंचा बनाया गया. यहीं बना दी गई लिफ्ट. लिफ्ट ऐसी जो लाखों टन वजनी जहाज को उठाती है, आगे सरकाती है और 26 मीटर की ऊंचाई वाले पानी में पहुंचा देती है.

    ऐसी लिफ्ट जो पानी के जहाज उठा देती है 

    दूसरी तरफ भी ऐसी ही लिफ्ट बनाई गई है. ये धीरे-धीरे करके जहाज को ऊंचाई वाले पानी से नीचे वाले पानी में उतार देती है. नहर के दोनों तरफ गेट बनाए गए हैं. जिनको लॉक बोला जाता है. यही लॉक ही जहाज को चढ़ाने या उतारने का काम करते हैं. 

    समझिए कैसे- मान लीजिए आप जहाज लेकर आए, आपको सामने गाटुन झील में जाना है. पहले आप लाइन में लगेंगे. आगे तीन चेंबर बने हैं. 26 मीटर को तीन बार में पार किया जाता है. 8-9 मीटर एक बार में. होता ऐसा है कि इन चेंबर के गेट इतने मजबूत हैं कि ये पानी और जहाज सबका वजन थाम लेते हैं. पहले आपका जहाज पहले चेंबर में जाएगा और गेट बंद कर दिया जाएगा. जब आप इस चेंबर में जहाज घुसाते हैं तो पानी का स्तर बराबर होता है, लेकिन गेट बंद होने के बाद इसमें लगभग चार करोड़ लीटर पानी भर दिया जाता है. इतने पानी से जहाज लगभग 8-9 मीटर ऊपर उठ जाता है और दूसरे वाले चेंबर के बराबर पहुंच जाता है. 

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    अब दूसरे चेंबर का गेट खुलता है और जहाज दूसरे चेंबर में जाता है. गेट फिर बंद होता है और अब आप दूसरे चेंबर में हैं. अब दूसरे चेंबर में पानी भरा जाता है और जहाज फिर से 8-9 मीटर ऊपर उठ जाता है. अब जहाज तीसरे चेंबर के बराबर पहुंच जाता है. एक बार फिर से पानी भरकर जहाज उठाया जाता है और अब ये जहाज गाटुन झील की सतह के बराबर पहुंच जाता है. अब आखिरी गेट खोल दिया जाता है और जहाज आराम से गाटुन झील में प्रवेश कर जाता है.

    एक मजेदार बात और है कि एक चेंबर से दूसरे चेंबर में जाने के लिए जहाजों को रेल के इंजनों से खींचा जाता है. चेंबर के दोनों ओर रेल की पटरियां बिछी हैं. इन्हीं इंजनों से टोचन करके जहाजों को खींचा जाता है और दूसरे चेंबर में पहुंचाया जाता है.

    दूसरी तरफ उतारे जाते हैं जहाज

    अब गाटुन झील पार करने के बाद एक और गेट मिलता है. इसमें उतारने की प्रक्रिया होती है. ठीक वैसे ही यहां भी तीन चेंबर हैं लेकिन यहां वो प्रक्रिया उल्टी होती है. मतलब जहां एक चेंबर में जहाज 8 मीटर ऊपर जा रहा था, इस बार नीचे आता है. ऐसे करके जहाज समुद्र के लेवल पर आ जाते हैं.

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    ये पूरी प्रक्रिया काफी खर्चीली और दिमाग वाली है लेकिन इसका विकल्प इससे भी ज्यादा खर्चीला है, क्योंकि अगर ये नहर न हो तो जहाजों को लगभग 12 हजार किलोमीटर का रास्ता नापना पड़ेगा. अब ये प्रक्रिया होती इतनी जटिल है कि लगभग 80 किलोमीटर का रास्ता तय करने में जहाजों को 10 घंटे का समय लगता है. फिर भी ये समय 12 हजार किलोमीटर चलने में लगने वाले समय की तुलना में बहुत कम है.

    ये नहर पनामा नाम के एक छोटे से देश में है. इस देश की कमाई का सबसे बड़ा इसी सिर्फ इसी नहर से ही आता है. क्योंकि साल भर में यहां से लाखों जहाज गुजरते हैं.

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    शाम ढलने के बाद महिलाओं की गिरफ्तारी क्यों नहीं होती?

    पुरानी फिल्मों में कई बार एक सीन आपने देखा होगा. किसी महिला से जुर्म हो जाता है और पुलिस को उस तक पहुंचने में शाम हो जाती है तो उसे रात की गिरफ्तारी से मोहलत मिल जाती है. महिला को सुबह गिरफ्तार किया जाता है. हकीकत में भी ऐसा ही होता है. अपवादों को छोड़ दिया जाए तो किसी भी महिला की गिरफ्तारी किसी भी अपराध की दशा में शाम ढलने के बाद नहीं की जा सकती है. महिलाओं की गिरफ्तारी के कुछ नियम और शर्तें हैं, जिन्हें जानना जरूरी है.

    दरअसल कई ऐसे मामले आए हैं, जिनमें गिरफ्तार महिला के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं हुई हैं. महिलाओं से जुड़े ऐसे अपराधों को रोकने के लिए एक नियम बनाया गया है कि किसी भी महिला को शाम छह बजे के बाद और सुबह छह बजे से पहले गिरफ्तारी नहीं की जा  सकती. 

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    IPC में तय किए गए हैं गिरफ्तारी के नियम

    दंड प्रक्रिया संहिता(CRPC), 1973 की धारा 46 महिलाओं की गिरफ्तारी पर स्पष्ट निर्देश देती है कि महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय के पहले किसी भी कीमत पर गिरफ्तार नहीं किया जा सकता.  महिला को सिर्फ महिला अधिकारी को ही छूने का अधिकार है. किसी भी पुरुषकर्मी महिला की गिरफ्तारी नहीं कर सकता. 

    अगर परिस्थितियां बेहद जटिल हैं और गिरफ्तारी बेहद जरूरी हो तब एक महिला पुलिस अधिकारी को पहले प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट की पहले परमिशन लेनी होगा, जिसके ज्यूरिडिक्शन के भीतर महिला ने अपराध किया हो. ऐसी दशा में गिरफ्तारी महिला ही करेगी.  सीआरपीसी में गिरफ्तारी के संबंध में सभी धाराएं 41 से 60 के बीच में हैं. इनमें वारंट से जुड़ी हुई धाराओं का भी जिक्र है. 

    स्त्री-पुरुष दोनों को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना जरूरी होता है. इसका जिक्र संविधान के मौलिक अधिकार में भी है. 

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    गिरफ्तारी का कारण बताना जरूरी

    संविधान का अनुच्छेद 22 यह कहता है कि किसी भी व्यक्ति को तब तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता जब तक कि उसे गिरफ्तारी का कारण न बताया जाए. उसे अपना वकील चुनने का भी अधिकार होगा. गिरफ्तार व्यक्ति का हक है कि उसे 24 घंटे के भीतर कोर्ट के सामने पेश किया जाए. अगर देरी हो तो उपयुक्त कारण भी मजिस्ट्रेट को बताना होगा. 

    एक कानूनी कहावत है कि Where there is right there is remedy. अगर कहीं अधिकारों का हनन है, तो उसका इलाज भी है. ऐसा कोई अधिकार नहीं है, जिसका उपचार नहीं है.

    अपने अधिकारों को जानना जरूरी होता है. अगर आप अपने अधिकारों को नहीं जानते हैं तो कानूनी प्रावधान आपके गले की फांस भी हो सकते हैं और कोई उनका दुरुपयोग भी कर सकता है.

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    26 जनवरी को ही क्यों मनाया जाता है गणतंत्र दिवस?

    आज हमारे देश का 72वां गणतंत्र दिवस है. 15 अगस्त 1947 को आजादी तो मिली लेकिन 26 जनवरी 1950 तक हमारे पास खुद का संविधान नहीं था. आजादी भले ही 15 अगस्त 1947 को मिली लेकिन इसकी भूमिका काफी पहले से बनने लगी थी.

    तय किया गया कि नया भारत अपने नए संविधान के हिसाब से चलेगा. 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक हुई. इसी संविधान सभा की जिम्मेदारी थी नया संविधान तैयार करना. 26 नवंबर 1949 को इस सभा की आखिरी बैठक हुई. यानी कुल दो साल 11 महीने और 18 दिन में हमारा संविधान तैयार हो गया. हमारा संविधान दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है.

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    संविधान तो 2 महीने पहले ही तैयार था

    अब आप ध्यान दें कि 26 नवंबर को 1949 को ही संविधान बनाने का काम पूरा हो गया था, लेकिन दो महीने तक इसे लागू नहीं किया गया आखिर ऐसा क्यों? 

    साल 1930 से पहले ही कांग्रेस की गतिविधियां तेज हो गई थीं. 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पंडित जवाहर लाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया. इसी दिन पूर्ण स्वराज यानी आजादी की मांग की गई. तमाम क्रांतिकारियों ने फैसला लिया कि जनवरी के आखिरी रविवार को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा. यह तारीख थी 26 जनवरी 1930. इस दिन पंडित नेहरू ने लाहौर में रावी नदी के किनारे तिरंगा झंडा लहराया.

    खास है 26 जनवरी की तारीख

    बाद में जब भारत का संविधान तैयार हो चुका था. तब भी संविधान को लागू करने के लिए यही 26 जनवरी की तारीख चुनी गई. यही कारण है कि 26 नवंबर 1949 को संविधान तैयार हो जाने के बावजूद दो महीने का इंतजार किया और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू किया गया. 

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    यह संविधान ही देश में सबसे ऊपर है. देश की हर गतिविधि संविधान के मुताबिक ही चलती है. हमारा संविधान लचीला रखा गया है, जिससे परिस्थितियों के हिसाब से उसमें बदलाव भी किए जा सकें.

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    फांसी की सजा सुबह ही क्यों दी जाती है?

    कभी मन में ख्याल आया है कि मौत की सजा पाए लोगों को क्यों सुबह ही फांसी दी जाती है? आखिर मारना ही है तो आराम से रात में लटका दें. एक आदमी अपनी जिंदगी के आखिरी दिन सुबह से शाम तक का वक्त तो देख ले. लेकिन बड़े सवेरे 5 बजे लटकाने से क्या फायदा मिलता है जेल प्रशासन को? 

    दरअसल आजाद हिंदुस्तान में अब तक 61 बार लोगों को फांसी दी जा चुकी है. आखिरी बार 20 मार्च को निर्भया के गुनाहगारों को फांसी के फंदे पर लटकाया गया था. नाथू राम गोडसे से लेकर धनंजय चटर्जी, अफजल गुरु और याकूब मेनन, तक सुबह की पहली किरण के साथ ही फांसी पर लटका दिए गए. और कोई काम सरकारी आदमी टाइम से नहीं करता लेकिन जेल प्रशासन और जल्लाद जिस दिन फांसी की सजा मुकर्रर है, उस दिन सामने वाले बंदें को फांसी पर लटकाना नहीं भूलते.

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    अंग्रेजों की है करतूत

    आइये वजह जानते हैं. दरअसल अंग्रेजों के जमाने से ही फांसी पर सुबह ही लटकाते थे. लेकिन अंग्रेज घाघ थे, उन्हें अपनी परंपराएं तोड़ने में गुरेज कब था. कहा जाता है कि भगत सिंह को शाम में फांसी दी गई थी. ऐसे कई मामले उस जमाने के हैं. यह ऐसी प्रथा है, जिसे दुनियाभर में अपनाया जाता है. जहां कहीं भी फांसी दी जाती है, वहां सुबह ही लटका देते हैं. अपने देश में जो जेल मैन्युअल है, वहां भी फांसी सुबह देने का रूल सेट है. 

    दिल्ली जेल मैन्युअल के पैराग्राफ 872 का कहना है कि किसी को भी फांसी के फंदे पर सुबह तड़के ही लटकाना चाहिए. दिन के उजाले, या सूरज की किरणों से पहले ही सजायाफ्ता शख्स को फांसी के फंदे पर लटका दिया जाए. हां एक खास बात और, किसी भी शख्स को उस दिन नहीं फांसी नहीं दी जानी चाहिए, जिस दिन कोई पब्लिक हॉलिडे हो. यानी छुट्टी वाले दिन किसी को फांसी नहीं जानी चाहिए.

    कोई और नहीं देख सकता किसी की फांसी

    फांसी की एक और शर्त यह है कि अगर किसी को फांसी दी जाए तो कोई साथी कैदी उस फांसी को न देखे. जिस दिन किसी को फांसी देनी होती है, उस दिन सभी कैदियों को लॉकअप में ही रखा जाता है. किसी को तब तक लॉकअप से बाहर नहीं आने दिया जाता है, जब तक कि फांसी की प्रक्रिया पूरी न हो जाए और लाश को परिवार के हवाले या मुर्दाघर न पहुंचा दिया जाए.

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    हालात अगर प्रतिकूल हों तो केंद्र और राज्य सरकारें इनमें बदलाव कर सकती हैं. दरअसल कानून की दुनिया में कुछ भी करने का एक लॉजिक होता है. कॉमन सेंस लगाएं तो एक बार सामने आती है कि अगर सुबह फांसी दे दी जाए तो सभी कागजी प्रोसीडिंग्स, मेडिकल टेस्ट और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट दोपहर तक पूरी हो जाती हैं, जिससे मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार दिन में ही पूरा हो जाए. दूसरी बात ये कि जिस दिन फांसी होती है उस दिन शख्स को सुबह 3 बजे ही उठा दिया जाता है. अपने काम निपटाकर शख्स को इतना वक्त मिल जाता है कि वह अपने आराध्य को याद कर ले, सोच ले, और मान ले कि ये आखिरी दिन है. व्यवहारिक तौर पर मौत की डेट जानकर किसी का क्या ही मन लगेगा. अन्य सभी बातें बेमानी हैं. फांसी का वक्त नजदीक आते ही आदमी इस स्थिति में नहीं रहता कि वह कुछ और सोच सके. 

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    तीसरा कारण यह भी है कि फांसी बड़े स्तर पर खबर बनती है, जिसका असर समाज पर भी पड़ता है. कोई दिन में हंगामा शुरू करे इससे पहले ही फांसी पूरी कराकर प्रशासन तमाम हंगामों से बच जाता है.

    फांसी लगाने की प्रक्रिया क्या है, कैसे किसी को फांसी के फंदे से लटकाया जाता है, इसके बारे में जानने के लिए इंतजार करें, हमारे अगले वीडियो करा, तब तक के लिए जय हिंद.