Category: गेस्ट राइटर
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क्या महिलाएं युद्ध का कारण हैं?
आज सुबह मैं पार्क में व्यायाम करने के उपरांत कुछ देर सुस्ताने के लिए बैठ गया। वहां कुछ बुजुर्ग पुरुष महिलाओं के विषय में चर्चा कर रहे थे। उनमें से एक महानुभाव ने कहा-“आज तक जितने भी युद्ध हुए हैं वह सभी महिलाओं के कारण हुए हैं !” वहां खड़े सभी लोग प्रतिकार की बजाए…
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काश! इश्क़ की बातें होतीं
काश के मेरा नाम इश्क़ होता तुम्हारा नाम भी इश्क़ होता क्या होता जब सबका नाम इश्क़ होता। हम जिस देश में रहते उस देश का नाम इश्क़ होता हमारे घर का पूरा पता इश्क़ होता, वो इश्क़ में बोलता मै उसे इश्क़ में सुनता कैसा होता जब हम सबकी बोली में ही शामिल इश्क़…
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जल संरक्षण समय की जरूरत
जल ही जीवन है। यह बात कई दशकों से हम कहते एवम सुनते आ रहे हैं। जल हमें प्रकृति से एक उपहार के रूप में मिला है। पृथ्वी का तीन चौथाई हिस्सा पानी से घिरा हुआ है 30 फिर भी आज स्वच्छ जल की उपलब्धता एवम पानी का लगातार गिरता स्तर भारत सहित वैश्विक स्तर…
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पॉलिटिकल भक्ति: समयानुसार “जय श्री राम”
“जय श्री राम” बड़ा ही करिश्माई नारा है| सच में इसका उच्चारण करते ही “भक्तों” की छाती पूरे 56 इन्च फूल जाती है, जैसे किसी राष्ट्रवादी पम्प से हवा भर दी गई हो | कितनी कमाल की बात है न! लोग अपने सारे दुख, नोटबन्दी और जी0एस0टी0 की “सफ़लता” और पागल हो रहे विकास को…
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महिलाओं की लड़ाई पुरुषों से नहीं समाज से है
भारत में आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, और रोजगार जैसे विषयों पर महिलाओं कि स्थिति अब भी बहुत ज्यादा नहीं बदल पायी है।कुछ बदलाव जरूर देखने को मिलते हैं लेकिन ये काफी नहीं हैं। आज से कुछ दशक पहले महिलाओं पर सत्ती प्रथा, बाल विवाह ,विधवा महिलाओं के पुनर्विवाह पर रोक जैसे तरह-तरह के अत्याचार होते…
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क्या है वाल ऑफ़ काइंडनेस की कहानी?
दुनिया में दीवारों की कमी नहीं है। अनगिनत दीवारें हैं। हर घर में कई दीवारें हैं जिन पर छत टिकी है और उन छतों पर उम्मीदों का आसमान बिछा है। देश दुनिया की मशहूर दीवारों में चीन की दीवार है जिसे दुनिया का अजूबा माना गया है। जर्मनी को बाँटती मशहूर बर्लिन की दीवार है…
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क्या ठरकी पत्रकारिता के अच्छे दिन चल रहे हैं?
तथ्यपरक सवाल, वस्तुपरख पत्रकारिता, सरकार से उद्देश्यपरक सवाल अब नही पूछे जाते हैं। जनवादी पत्रकारिता अब विरले ही देखने को मिलती है। समय के साथ साथ देश, देश की मानसिकता, देश की शासन पद्धति सब कुछ बदली है, तो इस बदलाव के लहर से पत्रकारिता भला कैसे अछूती रहती? पहले पत्रकारिता व्यापक नही थी, जनसमूह…