Tag: भवेश दिलशाद
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बहुत मुश्किल है अब कुछ भी यक़ीनी तौर पर कहना
फ़लक से तोड़कर क़िस्सा ज़मीनी तौर पर कहनाबहुत मुश्किल है अब कुछ भी यक़ीनी तौर पर कहना. किसे चाहें किसे मानें किसे छू लें किसे जानेंये बातें दिल की बातें हैं न दीनी तौर पर कहना. उसे फाज़िल कहो ऐसे हमें जाहिल सुनाई देक़सीदे में ये फ़न है नुक़्ताचीनी तौर पर कहना. मुहब्बत की सलाहीयत…
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हर सरहद को तोड़ ही देगी आज़ादी…
हर सरहद को तोड़ ही देगी आज़ादी दुनिया भर को घर कर देगी आज़ादी. दिल में रह-रह मौज उठेगी आज़ादी जान तो इक दिन लेके रहेगी आज़ादी. जिस्म ये आख़िर गल जाये या जल जाये रूह तो लेकर साथ चलेगी आज़ादी. तिनका तिनका ज़र्रा ज़र्रा जागेगा नींद ढलेगी शब से खुलेगी आज़ादी. चांद तकेगा तारे…
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ख़ुदकुशी…भवेश दिलशाद (शाद) की नज़्म
इसी इक मोड़ पर अक्सर गिरा जाता है ऊंचाई से अपनी ज़ात और ख़ाका मिटाया जाता है सब कुछ हो जिसमें ये सिफ़अत, क़ूवत कि जो अपना सके, जो घोल पाये सब कुछ अपने में ग़मे-दिल और ग़मे जानां कहे बिन सह सके जो सब किसी इतनी बड़ी हस्ती के पहलू में किया जाता है…
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मिलती मुद्दत में है और पल में हँसी जाती है
आप की याद भी बस आप के ही जैसी है, आ गई यूँही अभी यूँही अभी जाती है।
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कभी तो सामने आ बे-लिबास हो कर भी
कभी तो सामने आ बे-लिबास हो कर भी, अभी तो दूर बहुत है तू पास हो कर भी. तेरे गले लगूँ कब तक यूँ एहतियातन मैं, लिपट जा मुझ से कभी बद-हवास हो कर भी. तू एक प्यास है दरिया के भेस में जाना, मगर मैं एक समुंदर हूँ प्यास हो कर भी. तमाम अहल-ए-नज़र…