मोदी-केसीआर

…तो मोदी और केसीआर का रिश्ता फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स वाला है?

के. चंद्रशेखर राव ने अपने राजनीतिक अनुभव और चालाकी के हिसाब से सबसे धांसू चाल चली है। फौरी तौर पर देखने से ऐसा लगता है कि केसीआर के नाम से चर्चित तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के मुखिया चाहते हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले-पहले विधानसभा जीत ली जाए। हालांकि, राजनीतिक दावपेंच समझने वाले मान रहे हैं कि यह सब इतना आसान तो कतई नहीं होने वाला है।

मोदी बनाम राहुल बनाम केसीआर
टीआरएस नेताओं की मानें तो उनकी पार्टी यह कतई नहीं चाहती थी कि राज्य में विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ हों। इसके पीछे तर्क है कि ऐसी हालत में चुनाव मोदी बनाम राहुल हो जाएगा और तेलंगाना में कोई आधार न रखने वाली बीजेपी को भी फायदा होगा और राज्य में अच्छी पकड़ वाली टीआरएस कहीं पीछे छूट जाएगी। वहीं खुद केसीआर नरेंद्र मोदी से अच्छे संबंध रखते हैं और सीधे-सीधे उनपर हमला करने से बचते हैं। वह भी चाहते हैं कि राज्य में विधानसभा चुनाव हों तो केसीआर बनाम मोदी नहीं बल्कि केसीआर बनाम कांग्रेस हो।

केसीआर और मोदी की दोस्ती!
बीते कुछ महीनों में केसीआर ने नरेंद्र मोदी से कई मुलाकातें कीं हैं। हालांकि, बीजेपी से गठबंधन को साफ नकारते हुए उन्होंने यह भी कहा कि सांप्रदायिक पार्टी के साथ उनकी 100 पर्सेंट सेक्युलर पार्टी का मिलना असंभव है। दूसरी तरफ केसीआर औवैसी की पार्टी से दोस्ती बरकरार रखने की बात कहते हैं। मोदी से दोस्ती की बात को देखें तो सीधा-सीधा नजर आता है कि मामला ‘फ्रेंड्स विद बेनिफिट’ वाला है। मतलब दोनों के बीच में कोई न कोई बात तो ऐसी है, जो नरेंद्र मोदी और केसीआर अच्छे से समझ रहे हैं लेकिन खेल तब होगा जब जरूरत होगी।

थोड़ा अलग तरीके से समझते हैं
तेलंगाना में बीजेपी आधार तलाश रही है। लोकसभा की 17 में से सिर्फ एक सीट बीजेपी के पास है जबकि 12 सीटें टीआरएस के पास है। आंध्र प्रदेश के चंद्रबाबू नायडू से अलग होने के बाद बीजेपी को दक्षिण में एक नए साथी की तलाश है, ऐसे में वह नया साथी टीआरएस भी हो सकती है। हालांकि, मोदी और केसीआर की मुलाकातों के बाद चुप्पी को देखें तो लगता है कि ऐसा कुछ चुनाव के बाद के नतीजों पर ही निर्भर करेगा।

विधानसभा में क्या होगा?
119 में से 90 विधानसभा सीटें जीतकर टीआरएस ने सरकार बनाई थी। फिलहाल तो केसीआर के मुकाबले किसी के पास कोई चेहरा नहीं दिख रहा है। ऐसे में केसीआर के अंदर भी उतावलापन है कि वह दोबारा सरकार बना लें और 2019 तक फ्री रहें, जिससे बीजेपी या तीसरे मोर्चे के साथ सही से बाजी खेल सकें। अनुमान लगाया जा सकता है कि 2019 में बनने वाली केंद्र सरकार में केसीआर अपना हिस्सा जरूर लेंगे।

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