गुजरात चुनाव: क्या विकास सच में बौराएगा?

बेइमानी करके ही सही, मेरा मतलब है जहांपनाह के सजदे में सर झुकाते हुए केचुआ यानि केंद्रीय चुनाव आयोग ने गुजरात विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। गुजरात की 182 सीटों पर दो चरणों में मतदान की घोषणा की गई। पहले चरण का चुनाव 9 दिसंबर (89 विधानसभा सीटों के लिए) जबकि दूसरे चरण का चुनाव 14 दिसंबर (93 विधानसभा सीटों के लिए) को होगा। राजनीतिक धुरंधर इसे 2019 लोकसभा चुनाव का लिटमस टेस्ट मान रहे हैं। कांग्रेस इस चुनाव से राजनीति में अभूतपूर्व वापसी की राह तक रही है।

करीब से देखा जाए तो कांग्रेस के पास खोने के लिए इस उम्मीद के अलावा कुछ भी नहीं है लेकिन विकास ब्रांड वाली पार्टी अर्थात बीजेपी को विकास से लेकर 2019 वाली कुर्सी भी दांव पर लगती नजर आ रही है। लगातार दिल्ली से गुजरात का आसमान नापते मोदी के जहाज इस बात का साक्ष्य हैं कि मोदी को अब अपना घर इतना सुरक्षित नहीं लगता। मोदी ऐंड कंपनी को वाकई होमवर्क की जरूरत है। बीजेपी के पास लाख योजनाएं हो जिसकी घोषणा कर वह अपनी पीठ थपथपा रही हो लेकिन कांग्रेस जीएसटी और नोटबंदी की नकारात्मक छवि को बड़ी आसानी से भुनाने में लगी है।

 

दिल्ली की कुर्सी का रास्ता भले उत्तर प्रदेश से होकर जाता हो लेकिन गुजरात चुनाव 56 इंच के सीने वाले मोदी के लिए नाक का सवाल है। चुनाव अगर बीजेपी हार गई तो मोदी की 2019 की कुर्सी भी हाथ से जाएगी, साथ ही मोदी अपने राजनीतिक करिश्में के पतन की शुरूआत भी देखना शुरू कर देंगे। गुजरात में बीजेपी ने अब तक मोदी के कद के इर्द गिर्द का नेता भी नहीं पैदा किया है। मोदी के दिल्ली जाने के बाद गुजरात बीजेपी के हिस्से में एक बड़ा सा शून्य पैदा हो गया है। जिसके कारण भाजपा को और मेहनत करनी पड़ रही है और मोदी को भाग-भाग कर गुजरात आना पड़ रहा है।

 

गुजरात का जातीय समीकरण की चुनाव में कितनी अहम भूमिका है इसका  पता इससे लगता है कि चुनाव के ऐलान के बाद पाटीदारों द्वारा दलगत राजनीति में शुमार होने की होड़ सी लग गई। किसी ने बीजेपी का दामन थामा तो कोई भाजपा के विरोध में कांग्रेस के समर्थन की बात कह रहा है। बात यहीं खत्म नहीं होती है, पाटीदारों की गुजरात की आबादी में कुल 12 फीसदी की हिस्सेदारी है। पाटीदार गुजरात की 182 विधानसभा सीटों में से 21 सीटों पर अच्छी पकड़ रखते हैं। वह कुल वोट हिस्सदारी का 16 प्रतिशट वोट साझा करते हैं। दलितों की गुजरात राजनीति में सक्रियता हाल ही में मीडिया में आए ऊना जैसी घटनाओं के बाद बढ़ी है।

 

गुजरात की कुल आबादी में ओबीसी, एससी और एसटी की हिस्सेदारी 78 फीसदी है। उनका आरोप है कि इतनी बड़ी आबादी के बावजूद इन जातियों और समुदायों को बीजेपी सरकार ने पिछले 22 वर्षों से अनदेखा कर रखा है। ऐसे आकड़ों के आधार पर हार्दिक पटेल और अन्य पाटीदारों का कद यहां की राजनीति में बढ़ जाता है। जो बीजेपी के लिए बड़ा सिर दर्द है।

 

चुनावी सर्वे का आंकड़ा

हाल में आए चुनावी सर्वे के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी 48 फीसदी वोट शेयर करती है और वहीं कांग्रेस, अल्पेश और जिग्नेश मेवानी को मिला कर कुल वोट शेयर हो जाता है 38 फीसदी और हार्दिक के पास 2 प्रतिशत वोट शेयर है तो साथ ही वाघेला और आप सहित अन्य के खाते में 12 फीसदी वोट शेयर हो रहे हैं। सर्वे भले भाजपा को जीतता तय मान रहें हो लेकिन संभावनांए कई अन्य भी हैं। मतलब साफ है कि भाजपा के वोट प्रतिशत में गिरावट के साथ ही यह भी तय है कि अगर सीटों की संख्या कम हुई तो कांग्रेस कुर्सी पर काबिज होने या यूं कह ले मोदी के वर्चस्व को रोकने के लिेए छोटे दलों संग सरकार बनाने पर आमदा हो जाएगी। कांग्रेस को रिवाइवल का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा। भाजपा को दो दशकों की ऐंटी इंकबैंसी का भी भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। 1995 से सत्ता पर काबिज हो चली आ रही बीजेपी से लोगों का मन उखड़ सा रहा ही है साथ ही नोटबंदी और जीएसटी जैसे मुद्दे भी जनता के गले से नीचे नहीं उतरे हैं। खैर नतीजे जो भी हो राजनीति में उतार चढ़ाव हर पार्टी को देखनी ही पड़ती है।

 

कांग्रेस भी 1985 में 182 में से 149 सीटें जीत कर सत्ता में आई और उसके बाद फिर उसके लिए गुजरात चुनाव में अपने बलबूते पर वापसी करना टेढ़ी खीर बन गया। इस चुनाव की सबसे अहम खासियत यह है कि दोनों बड़ी पार्टियां अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रही हैं। कांग्रेस का हारना उसे दूर मरण शैय्या पर ले जाएगा तो बीजेपी का हारना उसके विकास का बौराना साबित करेगा, साथ ही उसके विजय के चर्मोत्कर्ष से झकझोर कर पतन के डूबते सूरज की तरफ इशारा भी करेगा। वहीं हार्दिक और जिग्नेश जैसे नेता फिर अपना आधार न ढ़ूढ़ कर किसी पार्टी के पिछलगू बनते नजर आएंगे। परिणाम की प्रतीक्षा कीजिए। देखिए आगे होता है क्या…


यह लेख नवीन राय ने लिखा है। नवीन से फेसबुक पर जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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