शीला दीक्षित

…तो इस बार बिना लड़े ही हार गईं शीला दीक्षित?

जनरल नॉलेज की किताबों में दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में सबसे पहला नाम शीला दीक्षित का ही पढ़ा था। पहली बार दिल्ली पहुंचने के बाद उनके कार्यकाल में हुआ विकास भी देखा। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले वह फिर से दिल्ली कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। मन हार चुकी कांग्रेस में थोड़ी जान आ गई। कांग्रेस लड़ी भी। पहले से बेहतर प्रदर्शन किया। लेकिन सीटों की संख्या जीरो रह गई।

विधानसभा चुनाव के लिए भी शीला दीक्षित ने तैयारी शुरू कर दी थी। लेकिन इस बार पीसी चाको से टकराव बढ़ गया। दो-तीन दिन पहले ही एक लेख पढ़ा कि शीला दीक्षित कोई बहुत बड़ा कदम उठा सकती हैं। लेकिन इनता बड़ा? यहां शीला दीक्षित बिना लड़े ही हार गईं। प्रकृति से वह नहीं लड़ पाईं और धरती छोड़कर चली गईं।

लोकल डिब्बा को फेसबुक पर लाइक करें।

पीसी चाको ने कहा- आप आराम कीजिए

तीन दिन पहले ही पीसी चाको ने शीला दीक्षित को एक पत्र लिखा। पत्र में शब्द थे: आपकी तबीयत ठीक नहीं है, आपको आराम करना चाहिए। शीला अब आराम ही करेंगी लेकिन कम समय के लिए नहीं बल्कि हमेशा के लिए। दिल्ली की कांग्रेस को हमेशा उनकी कमी खलती रहेगी। फिर से कांग्रेस को दिल्ली में नया नेतृत्व तलाशना होगा।

शीला दीक्षित की पहचान उनके विकास कार्य को लेकर रही है। दिल्ली में मेट्रो नेटवर्क का विस्तार हो या फ्लाइओवरों का जाल बिछाना। हर काम में उनकी की छाप दिखी। 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स दिल्ली में हुए। बड़े-बड़े काम हुए और उतने ही बड़े घोटाले भी। पूरी कांग्रेस चौतरफा घिरी। केजरीवाल और किरण बेदी ने अन्ना हजारे के सहारे कांग्रेस को घेरा। संघ और अन्य संगठनों ने आंदोलन को पिछले दरवाजे से मजबूती दी। देश में कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ गजब का माहौल बना।

कांग्रेस ने सबसे बड़ी गलती कर दी थी

यहां कांग्रेस सबसे बड़ी गलती कर गई। कांग्रेस ने आंदोलन को रोकने की कोशिश कम की। उसके नेताओं का गुरूर सिर चढ़कर बोल रहा था। कई नेताओं ने अन्ना की टीम को उल्टा-सीधा कहा। किसी ने यहां तक चुनौती दे डाली कि दम हो तो चुनाव लड़ लो। बस यहीं से सबकुछ कांग्रेस के खिलाफ होने लगा। जमुनापार की छोटी-मोटी गलियों में सामाजिक परिवर्तनों के लिए काम करने वाले अरविंद केजरीवाल ने सीधी चुनौती शीला दीक्षित को दे दी।

शीला दीक्षित ने शुरुआत में केजरीवाल, उनकी टीम और लोकपाल बिल को भी हल्के में लिया। लेकिन नियति कुछ और ही थी। इसके आगे क्या हुआ सबने देखा। दिल्ली खो चुकी शीला दीक्षित को कांग्रेस ने रिटायर नहीं किया। उन्हें केरल का राज्यपाल बनाया गया। इसके बाद लगा कि शीला दीक्षित रिटायर हो जाएंगी लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव में उन्हें फिर उतारा गया। सीधे सीएम कैंडिडेट बनाकर। बाद में कांग्रेस-सपा के गठबंधन के बाद शीला वापस चली गईं। 2019 के लोकसभा चुनाव में फिर से उन्हें दिल्ली कांग्रेस में लाया गया।

इस लेखक के और लेख

कुलभूषण जाधव केस: इंटरनैशनल कोर्ट में भारत जीता या पाकिस्तान हारा?

कुलदीप सिंह सेंगर

कुलदीप सिंह सेंगर को बीजेपी ने आखिर कब निलंबित कर दिया?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हमारा Youtube चैनल

पुराना चिट्ठा यहां मिलेगा

August 2026
SMTWTFS
 1
2345678
9101112131415
16171819202122
23242526272829
3031