आखिर कैसा हो आज के समय के आंदोलनों का स्वरूप?

जातियों और समुदायों के बीच बढ़ रही खाई के जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ हम हैं, ना की कोई सरकार, प्रशासन, पार्टी या नेता। हम खुद ही अपने बीच में विनाश के बीज बो रहे हैं, अंततः फसल भी कुछ उसी प्रकार की काटने को मिल रही है। कल तक सवर्ण जाति, पिछड़ों और दलितों को डराती थी,आज पिछड़े और दलित सवर्णों को डराने में लगे हैं। दलितों द्वारा हो रहे हिंसक आंदोलन का कोई एक कारण नहीं बल्कि इसके पीछे बहुत से कारण हैं, ये कुछ हद तक हमारे समाज में फैली ऊँची-नीची, बड़ी-छोटी जाति जैसे भेदभाव वाले बीज की ही फसल है, जिसे आज हमारा समाज काट रहा है।

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट का अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम के बारे में जो फैसला आया, उसी के विरोध में भारत बंद का ऐलान दलित संगठनों द्वारा किया गया। हालांकि, पूरा भारत बंद तो नहीं हुआ लेकिन भारत के कुछ हिस्से हिंसा की आग में जले जरूर। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जो बात कही थी वह यह थी कि सिर्फ प्राथमिकी के आधार जो गिरफ्तारी होती है, वह गलत है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से असहमति होने पर उस याचिका के खिलाफ पुनर्विचार याचिका डाले जाने का प्रावधान है और केंद्र सरकार द्वारा इस मसले में पुनर्विचार याचिका डाल भी दी गई लेकिन इसके बावजूद ये आंदोलन और उग्र होता गया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की असहमति में ऐसा विरोध प्रदर्शन पहली बार नहीं हुआ है, अभी हाल ही में फ़िल्म पद्मावत पर भी कुछ संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में सड़कों पर उत्पात मचाया था, हालांकि वह विरोध अतार्किक था और यह आन्दोलन करनी सेना के अतार्किक आंदोलन से काफी अलग है।

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दलित समुदाय को अपने हक़ और सम्मान के लिये तार्किक आंदोलन करने का पूरा अधिकार है लेकिन आंदोलन के नाम पर हिंसा एक शर्मनाक प्रसंग है। अभी हाल ही के दिनों में महाराष्ट्र के किसानों द्वारा किए गए आंदोलन ने पूरे देश ही नहीं पूरे विश्व में एक मिसाल कायम की। उनके इस महान आंदोलन की सरकार, प्रशासन से लेकर आम नागरिकों ने भी सराहना की, उनकी मांगों के आगे सरकार को झुकना भी पड़ा लेकिन उसके कुछ ही दिन बाद ऐसा हिंसात्मक आंदोलन उस आंदोलन की महानता पर एक भद्दे दाग जैसा है। अन्ना हजारे ने भी शांतिपूर्ण आंदोलन करके उस वक़्त की तत्कालीन सरकार की नींव को हिला दिया था, सरकार में खौफ का माहौल पैदा कर दिया था, याद रहे कि वह खौफ भी शांतिपूर्वक आंदोलन से पनपा था। ये सब इसी दौर में हो रहे आंदोलन हैं, इन आंदोलनों का भी एक स्वरूप है जिसपर विचार करना चाहिये।

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शांतिपूर्ण हो आंदोलन

दलितों का उत्पीड़न बरसों से होता आया है, इस पर दो राय हो ही नहीं सकती है। आज भी बहुत हद तक कुछ असामाजिक ताकतों द्वारा दलितों के साथ दुर्व्यवहार की घटनायें सामने आती रहती हैं लेकिन उसके लिए कानून ने और संविधान ने उतने अधिकार दिए हैं कि वह अपने ऊपर हो रहे अत्याचार को और अपनी आवाज को संवैधानिक तरीके के उठा सकें। अगर आंदोलन संवैधानिक हो तो आंदोलन को राजनीतिक रूप देने वालों को एक बार सोचना जरूर पड़ता है। शांतिपूर्ण आंदोलनों को आम लोगों की सहानुभूति भी प्राप्त होती है, वे चाहे किसी भी समुदाय या जाति के हों। हिंसात्मक आंदोलन आपकी नीयत और समझ पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं, ऐसे आंदोलन आपके समुदाय को ही नहीं बल्कि पूरे समाज को शर्मसार करते हैं। हमें सोचना और समझना चाहिए कि हिंसात्मक आंदोलन से अपना ही नुकसान होता है, फिर वह आंदोलन, आंदोलन नहीं रह जाता उसका स्वरूप बदल जाता है। अगर आंदोलन को महान और विश्वव्यापी बनाना है तो अहिंसात्मक आंदोलन से बेहतर कोई विकल्प नहीं।

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