कविताई बुर्क़े हटा के आ गयीं, घूंघट उठा के आ गयीं, ये औरतें कमाल.. लोकल डिब्बा टीम March 9, 2020 0 डर से निजात पा चुकीं, जीने को मरने आ चुकीं, धरने पे मुल्क ला चुकीं, ज़िद इनकी है बहाल, सलाम..