नेता बनने के 150 फायदे, जानिए क्यों बनना है ज़रूरी?

बचपन में कभी पढ़ाई के वक्त हिंदी व्याकरण के तहत हमें परीक्षा में भरने को आता था वाक्यांश के लिए एक शब्द. उस वाले सेक्शन में एक सवाल ऐसा भी था जो रिपीट मोड में आता था. मतलब आप किसी भी क्लास में पहुंच जाएं वो सवाल हर बार पूछा जाता था.
सवाल था-
वाक्यांश के लिए एक शब्द लिखें.
अ- जो हर हर जगह मौजूद हो
बचपन में इसका जवाब लिखते थे सार्वभौमिक.

अब दरअसल पाठ्यक्रम बदल गया है. इन दिनों इस सवाल की सही जवाब है, ‘नेता.’
इस ऑप्शन में अगर कहीं ‘मोदी’ दिखे तो टिक वहीं मारना है. सटीक उत्तर की प्राथमिकता में मोदी शब्द भी है.

हिंदी की विशेषता रही है, समय दर समय खुद को बदलती रही है. चुनावी मौसम में हिंदी ने खुद को बदल लिया है. आप भी जवाब ढंग से लिखें. खैर 2014 के बाद से ही मोदी दिख रहे हैं.

इंसान होना नाकाफी है इंसान जमाने में. ईश्वर होना में भी कोई किक नहीं है. ईश्वर किसी-किसी को दिखता है. जिसे दिखता है, वो भी ढंग से नहीं बताता कि वो कैसा दिखता है?

मार्केट में कई तरह के भगवान भी हैं. कुछ वाले होते हैं पर दिखते नहीं, मतलब दिखते ही नहीं. न कोई आकार, न कोई प्रकार.
जिनके वालों की एक तयशुदा शक्ल है वे भी तो नहीं दिखते. जहां उनके अड्डे पर अगर जाएं तो कुछ बोलते नहीं. न वीडियो, न बाइट, न लाइमलाइट. ये भी कोई जीना है.

फिल्म स्टारों का क्या है, तभी दिखते हैं, जब फिल्म आती है. फिल्म सिनेमा हॉल से उतरी कि स्टार नदारद. सो सितारा बनने का कोई फायदा है नहीं. नेता बनने में फायदा है. तभी तो फिल्मी दुनिया छोड़ सनी देओल गुरदासपुर से चुनावी मैदान में उतर गए. जहां जा रहे हैं, लोग फोटो खिंचवा रहे हैं. हैंड पम्प लेकर स्वागत कर रहे हैं.

सो नेता ही बनना कलियुग में श्रेयस्कर है. कितने फायदे हैं, नम्बरिंग करके गिनाए जा सकते हैं.

कुछ भी करने की छूट
अगर आप पश्चिम बंगाल में नहीं हैं, तो कुछ भी बोल सकते हैं. वहां एक बीजेपी महिला विरांगना ने बोलने की कोशिश की थी, मतलब ममता बनर्जी की मॉर्फ्ड तस्वीर शेयर मार दी थी. दीदी ने दीदी को जेल भिजवा दिया. क्या है न वहां, दीदी ही भगवान हैं. उनकी इच्छा के बिना पत्ता नहीं होता. जिसकी इच्छा से देश में कुछ भी हो रहा है(अमित शाह) उनकी भी वहां नहीं चलती. क्योंकि दीदी, दीदी हैं.

बाकी जगह गरियाना हो, लतियाना हो, धक्का-मुक्की करना हो सबकी खुली छूट. इन दिनों अभिव्यक्ति की आजादी औसत से 4 गुना ज्यादा हो जाती है. चुनाव आयोग है जो कुतरना चाहता है. लेकिन उन्हीं के जो थोड़े कमजोर लोग हैं. मजबूत लोगों से कोई पंगा नहीं लेना चाहता. क्योंकि चुनाव बाद तो भी जिंदगी काटनी होती है.

दंगा कराने की छूट
देश में इंसान हों न हो हिंदू मुसलमान बहुत हैं. गली-गली, चौराहे-चौराहे में. घर-घर में, जंगल में भी. लेकिन ये महज वोट ही हैं नेता के लिए. जहां एकदम शांत माहौल चल रहा हो समझ लो गलत आइलैंड में फंस गए हो आप. कोई नेता नहीं है वहां. नेता कुछ सही होने नहीं देते. 5,000 वर्षों में ऐसा एक उदाहरण नहीं है जब किसी सच्चे नेता ने कुछ सही होने दिया हो.

भारत में तो अंग्रेज भाइयों के आगमन के बाद जो हुआ उसे तो जनता आज भी झेल रही है. पूरा मुल्क दो फाड़ हो गया. अब दोनों जगह एक-दूसरे को गाली देकर, हमले कराकर, सिंह गर्जना करके सरकारें बनती हैं. यही फायदा है. इसका भी लाभ डायरेक्ट नेताओं के पॉकेट में जाता है. भारत में आजकल मोदी के पॉकेट में जा रहा है, पाकिस्तान में इमरान खान के.

दूसरे करें काम-क्रेडिट अपने नाम
सीमाओं पर सैनिक लड़ते हैं. पड़ोसी देश में घुसकर आतंकियों को सैनिक मारते हैं. जान उनकी जाती है. शहीद वे होते हैं. परिवार उनके बेघर होते हैं. पत्नियां उनकी विधवा होती हैं. बच्चे उनके सड़क पर आते हैं. बेशर्म सिस्टम की मार उन्हें झेलनी होती है. क्रेडिट मोदी जी लेते हैं. लोकसभा चुनाव 2019 के आरंभ से अंत तक एक ही नारा छाया रहा. ‘मोदी ने पाकिस्तान में घुसकर आतंकियों को मारा.’

मारने का पता नहीं, 2015 में मोदी जी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को झप्पी देकर आए थे. एक दिन इसी साल फोन भी किया था. बधाई दी थी. लेकिन हर चुनावी रैली में चिल्लाते हैं कि मैंने पाकिस्तान में घुसकर आतंकी ठिकानों पर बम बरसाए. ये मोदी है, घर में घुसकर मारता है. शब्दों पर डिट्टो न जाएं, भाषण सुनें, सेंट्रल आइडिया यही है.

पप्पू हों तब भी हीरो
ये मीडिया वाले मस्त होते हैं. मजाक भी उड़ाते हैं, मौज भी लेते हैं. जब से राहुल गांधी पप्पू बने, तब से लेकर अब तक पप्पू ही कहे जा रहे हैं. लेकिन उनके इंटरव्यू के लिए लालायित हैं मीडिया वाले. मोदी का काउंटर नैरेटिव वही तो हैं. प्यार बांट रहे हैं. मोदी के जितने भक्त अभी दिख रहे हैं, जिस दिन कम होंगे, पप्पू के भक्त बनेंगे. बंदे का पीएम बनना तो तय है जी.

कुलमिलाकर आप खांसते हों(केजरीवाल), हांफते हों(नितिन गड़करी), फेंकते हों(नरेंद्र मोदी), थूकते हों(नहीं बताऊंगा), ठोकते हों(अमित भाई), आंख मारते हों(राहुल गांधी), डांटते हों(ममता बनर्जी) या लोटते हों(मनोज तिवारी विद 3333333 अदर्स) मीडिया में आप ही आप हैं बॉस.

सो इस दुनिया से विरक्ति लेते हुए, अंतरात्मा की आवाज सुनते हुए, एक ही पथ पर चलें. नेता बनें, देश बदलें. आपके अच्छे दिन जरूर आएंगे.

निवेदन: कृपया आहत न हों.

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