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हिंदुत्व और मराठी के नाम पर पीटने वाले सचमुच सेक्युलर हो गए?

राजनीति और मौकापरस्ती. ये दोनों पर्यायवाची जैसे हो गए हैं. महाराष्ट्र में इसका ताज़गी बरक़रार है. मराठी मानुष के नाम पर शिवसेना बनी. बाल ठाकरे ने मराठियों के नाम पर जमकर गुंडागर्दी की. दूसरे राज्यों के लोग महाराष्ट्र में पीटे गए. अचानक से बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे ‘सेक्युलर’ हो गए हैं. कट्टर हिंदुत्व की छवि ढोने वाला ठाकरे परिवार सेक्युलरिज़्म की दुहाई देने लगा है. अब आप ही तय करिए कि यह राजनीति है कि मौकापरस्ती.

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चंद महीनों में बदल गई पूरी राजनीति

लोकसभा चुनाव 2019 में शिवसेना बीजेपी के साथ थी. तब तक वह हिंदुत्ववादी थी. उसे कांग्रेस के भ्रष्टाचार और एनसीपी के परिवारवाद से समस्या थी. कुछ महीनों में ही शरद पवार, शरद दादा हो गए. सोनिया गांधी लोकतंत्र की रक्षक. इतने ही वक्त में नरेंद्र मोदी प्रचंड हिंदुत्ववादी नेता से धोखेबाज हो गए. शिवसेना ने भी कलेवर बदल लिया. कहीं आंखें मूंद लीं तो कहीं जबरन हमले शुरू कर दिए. शायद यही मौकापरस्ती है.

सेक्युलरिज्म खुद हैरान है!

हाल में महाराष्ट्र के राज्यपाल ने जामवंत का रूप धारण किया. इस जामवंत ने हनुमान को याद दिलाया- उठो हनुमत, तुम तो हिंदुत्ववादी हो, तुम तो कट्टर रहे हो, तुम तो राम भक्त रहे हो. लेकिन न तो ये त्रेतायुग है और न ही अब हनुमान जैसी स्वामिभक्ति बची है. लिहाजा अंजाम ये हुआ कि मराठी हनुमान लंका की ओर नहीं उड़े. उन्होंने कलम उठा ली. कलम उठी तो लपेटे में जामवंत ही आए. जामवंत से सवाल हुए कि तुम तो सेक्युलरिज्म की कसम खाते हो? भले मन से न खाई हो लेकिन खाई तो है, कम से कम उसी की शर्म कर लो.

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रंगे सियारों की है लड़ाई

दरअसल, इस युद्ध में राम और रावण दोनों धूर्त हैं. यहां जामवंत और हनुमान में भी मतभेद है. आलम यह है कि जिन लोगों के डर से सेक्युलरिज्म शब्द संविधान में जोड़ा गया, वही इसके रक्षक होने का दावा कर रहे हैं. रंगे सियारों की इस लड़ाई में, एक ऐसा सियार भी है, जो खुलेआम हुआं-हुआं करता है लेकिन खुद को सियार नहीं मानता. वही सियार दूसरे सियार को बता रहा है कि देखो तुम तो पहले सियार नहीं थे लेकिन अब सियार भी हो और रंगे भी हो.

कितने दिन दिखेगा यह सेक्युलरिज्म?

इन सब द्वंद्वों के बीच अहम सवाल यही है कि क्या सचमुच उद्धव ठाकरे अब सेक्युलर हो गए हैं? क्या मराठी मानुष के लिए लड़ने वाली शिवसेना हर राज्य के लोगों को स्वीकार करने लगी है? क्या कांग्रेस जैसी सेक्युलर पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर भी शिवसेना के साथ जा सकती है? क्या शिवसेना अपनी कट्टर छवि को हमेशा के लिए किनारे रख सकेगी?

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