संसद में नहीं हूँ, झख मार रही हूँ : तारकेश्वरी सिन्हा

एक बार डॉक्टर राम मनोहर लोहिया संसद में स्टालिन की बेटी स्वेतलाना को भारत में शरण दिए जाने की मांग कर रहे थे।

कांग्रेस सांसद तारकेश्वरी सिन्हा ने कहा,

“लोहिया जी आप तो बैचलर हैं, आपने शादी नहीं की, आपको औरतों के बारे में क्या मालूम।“
लोहिया जी तपाक से बोले,

“तारकेश्वरी तुमने मौका ही कब दिया?“
उस दिन ठहाकों की आवाज से पूरा संसद गूंज उठा था। तारकेश्वरी के बारे में ऐसी तमाम कहानियां है। उन दिनों नेहरू से लेकर लोहिया तक उनकी वाक्पटुता और सुंदरता के कायल थे। तारकेश्वरी के बारे में कहा जाता है कि वह देखने में जितनी खूबसूरत थीं उतनी ही बेहतरीन वह एक वक्ता के रूप में थीं। लोग अक्सर उन्हें ‘ब्यूटी विथ ब्रेन’ कहते थे।

संसद में जब भी वो भाषण देने या बहस करने उठती तो लोगों की आंख और कान दोनों तारकेश्वरी के हो जाते। यहां तक कि विपक्ष भी उनके शब्दों से घायल हो कर उनकी वाकपटुता का कायल हो जाता। कहते हैं कि उनकी हिंदी जितनी अच्छी थी उससे कई ज्यादा अच्छी उनकी अंग्रेजी थी और दोनों भाषाओं से भी उम्दा, उनकी उर्दू पर पकड़। कई बार तो वह संसद में बहस के दौरान तंज और तानों को भी उर्दू के मखमली अंदाज में लपेटकर विपक्ष को दे मारती थीं और सब के हांथ वाह–वाह कर टेबल थपथपाते रह जाते थे।

राजनीति हो या भाषा हो या अर्थशास्त्र, सब पर उनकी गजब पकड़ थी। शायद इसी को देखते हुए 1958 में नेहरू ने उन्हें वित्त मंत्रालय का कार्यभार सौंप कर भारत की पहली महिला उप वित्त मंत्री बनने का मौका दिया था।

26 दिसंबर 1926 को बिहार के पटना में जन्मी तारकेश्वरी की राजनीति में शुरुआत मगध महिला कॉलेज के छात्र संघ चुनाव को जीत कर हुई थी। वह भारत की पहली ऐसी महिला राजनेता थीं जिसके भारत छोड़ों आंदोलन में बड़ी ही सक्रियतापूर्वक भाग लिया था।

गुलामी के दिनों में गाँधी जी एक बार नालंदा आए थे। उन दिनों वहां हिन्दू–मुस्लिम दंगा हुआ था। चारों तरफ तनातनी का माहौल था और इन सब के बावजूद तारकेश्वरी बापू को लेने नालंदा जिले के नगर नौका पहुंच गई थी।

इसके कुछ ही महीनों बाद तारकेश्वरी अर्थशास्त्र में एमएससी करने ‘लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स’ चली गईं। सौभाग्य से जब वह लंदन से लौटीं तो देश आजाद हो चुका था और देश में पहला लोकसभा चुनाव होने ही वाला था। तारकेश्वरी बिहार के बाढ़ जिला से स्वतंत्रा सेनानी शील भद्र यजी के खिलाफ खड़ी हुईं और उन्हें हराकार मात्र 26 वर्ष की आयु में उन्होंने लोकसभा में एंट्री पा ली। इसके बाद 1957, 1962 और 1967 में बाढ़ जिले से ही जीत कर वह लगातार लोकसभा सांसद बनी रही।

पर ऐसा क्या था कि इंदिरा को तारकेश्वरी इतनी नापसंद थी?

दरअसल तारकेश्वरी इंदिरा के पिता पंडित नेहरू और पति फ़िरोज गांधी दोनों के ही बहुत करीब थी। कथेरिन फ्रैंक की किताब ‘इंदिरा’ में भी इस बात का जिक्र है कि फ़िरोज गांधी खुलेआम अपनी और तारकेश्वरी की नजदीकियों की कहानियों पर इतराया करते थे और इंदिरा को यह बात एक आंख नहीं सुहाती थी।

इसके अलावा इंदिरा को यह भी डर था कि नेहरू जिस तरह तारकेश्वरी के करीब थे और उन्हें पसंद करते थे, कहीं वह अपने बाद कांग्रेस का कार्यभार और प्रधानमंत्री का पद उन्हें न सौंप दें। नेहरू के बाद एक तारकेश्वरी का ही कद कांग्रेस पार्टी में इंदिरा से बड़ा था। भले ही मोरारजी देसाई भी कांग्रेस के आला नेताओं में थे पर इंदिरा और तारकेश्वरी में उन्होंने भी सदा तारकेश्वरी को ही चुना।

इंदिरा गांधी की इर्ष्या और तारकेश्वरी के प्रति उनकी नापसंदगी इस बात से भी पता चलती है कि एक बार 1971 में जब धर्मवीर सिन्हा ने तारकेश्वरी को चुनाव में हरा दिया था तो इंदिरा ने ख़ुशी के मारे धर्मवीर को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के कार्यभार से नवाजा था।

निश्चित ही तारकेश्वरी का कद भारतीय राजनीति में इंदिरा से काफी बड़ा था लेकिन 1969 में जब कांग्रेस टूटी और उन्होंने इंदिरा की जगह मोररारजी देसाई का खेमा चुना, कहते हैं कि उसी दिन से भारतीय राजनीति में उनकी सियासी पारी का अंत हो गया।

भारतीय राजनीति में अमूल्य 19 साल बिताने के बाद तारकेश्वरी सिन्हा ने जब राजनीति से संन्यास ले लिया तब उस वक्त जब भी लोग उनसे पूछते कि, ‘संसद में नहीं रहने के बाद आप क्या कर रही हैं?’, तो वह कहती थीं कि “जी चाहता है उन्हें उत्तर दूँ कि संसद में नहीं हूँ, झख मार रही हूँ।”

इस लेखक के और लेख

संता हो या बंता या शर्मा हो या वर्मा ,चलता रहेगा अपना हास्यधर्मा….

हैप्पी विमेंस डे (नियम व शर्तें लागू)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हमारा Youtube चैनल

पुराना चिट्ठा यहां मिलेगा

June 2026
S M T W T F S
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
282930