संता हो या बंता या शर्मा हो या वर्मा ,चलता रहेगा अपना हास्यधर्मा….

सुनिये जरा अपनी बत्तीसी फाड़ कर हँस दीजिये तो| काहे? काहे कि अब सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया है कि “कौन हसंता है ,किस पर हसंता है ,कितना हंसता है ,कैसे हंसता है इसे तय करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है|” पर भूलिए मत कि भारत एक भावना प्रधान देश है ,जहाँ अक्सर लोगों की भावनायें आहत हो जाती हैं|
याद आया कुछ या भूल गए सब? याद करिये जब आलिया भट्ट और सोनम गुप्ता बेवफ़ा नामक जोक्स नहीं थे तब जोक्स के नाम पर हमारे दो ही फेमस ‘पा जी ’ थे संता और बंता|ये वो नाम है जिस पर फरमाये हजारों अच्छे से अच्छे और वाहियात से वाहियात जोक्स पर हम और आप हँसते थे| कभी नहीं रुकने वाले जोक्स के उम्दा चरित्र होते थे संता बंता|फिर अचानक एक दिन लोगों को अपनी हंसी से ज्यादा समुदाय ख़ास की चिंता हुई|दावा करने वालों कहना था कि संता-बंता टाइप जोक्स में सरदारों को निशाना बनाया जाता है| एक खास समुदाय को उपहास का विषय बनाया जाता है|उन्हें बेवकूफ़ की तरह देखा जाता है| इससे उनकी भावनायें आहात हो गई|फिर क्या मामला इन द कोर्ट| हमेशा की तरह अपील-दलील और ‘कल्चरल वल्चरल’ बन गए वकील|

बात अपनी जगह ठीक भी है|किसी को किसी समुदाय को निशाना बनाने का हक़ नहीं दिया जा सकता|लेकिन यह युग ‘साड्डा हक़ ऐथे रख’ का युग है तो कोर्ट भी ऐसी याचिका पर विचार कर लेती है|मामला सुप्रीम कोर्ट में था तो खूब तर्क वितर्क भी हुए होंगे|क्या पता संता-बंता के साथ अपने शर्मा और वर्माजी को भी याद किया गया हो| पर अंत में अदालत को हंसी की जरुरत,जादू और संवेदनशीलता समझ आ गई| चलो गुरु देर आये पर दुरुस्त आये|नहीं तो इन दिनों जिस तरह हम राष्ट्रवादी और गैरराष्ट्रवादी युग में हैं वहां हमारा समाज या तो ‘लाफ्टर चैलेंज्ड’ बन सकता है या डबल मीनिंग वाला अश्लील सरस शलिल|

हमारे समाज को हमेशा से हँसने के लिए किरदार चाहिए ना कि सिर्फ 140 चेहरों वाला इमोज़ी|चाहे वो चार्ली चैपलिन हो या बीरबल जो अपने ही राजा का मज़ाक उड़ाते थे|सब अपने वक़्त के संता बंता रहे हैं| भला हो आलिया भट्ट,राहुल गाँधी,मफ़लर मैन केजरीवाल और सोनम गुप्ता बेवफ़ा का नहीं तो संता-बंता के खफ़ा होने पर हमारा क्या होता! आप सभी को शुक्रिया जी| स्पेशल थैंक्यू सुप्रीम कोर्ट को भी जिसने दुनिया को एक बार फिर बता दिया कि हवा और हंसी को भी भला कभी कोई रोक पाया है|अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि वह हँसने को लेकर कोई नैतिक नियमावली जारी नहीं कर सकती|अतः आप हंसिये की कि आप आज़ाद है दांत निकाल के या दबा के हंसने या हँसा ने के लिए|

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