शहरों से ठोकर मिला, हम चल बैठे गांव

माथे पर झोला लिये, मन में लिए जुनून
काटो तो पानी बहे, इतना पतला खून।
बेहद पथरीली डगर, पानी मिले न छांव,
शहरों से ठोकर मिला, हम चल बैठे गांव।

भूख यहां भी वहां भी, पर वो अपना देस,
रूखा-सूखा खाय ल्यो, जइहौ मत परदेस।
अपनी माटी प्रेम की, वाकी माटी सौत
अपनी ने जीवन दिया, दूजी ने दी मौत।

घाम लगे पाथर पड़े, कब इसकी परवाह
शहरों से अनसुनी थी, मजदूरों की आह।

सूखी रोटी गांव की, चुटकी भर का नोन
कटे कइसहूं आज बस, कल की सोचे कौन।
माना अपने गांव में, रहता बहुत कलेस।
कुल पीड़ा स्वीकार है, ना जाइब परदेस।

इस लेखक के और लेख

लॉकडाउन में शराब मिलने के बाद पढ़ें बेवड़ों का इंटरव्यू

हम फिर वापस आएंगे!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हमारा Youtube चैनल

पुराना चिट्ठा यहां मिलेगा

August 2026
SMTWTFS
 1
2345678
9101112131415
16171819202122
23242526272829
3031