यह तस्वीर हमारी असंवेदनशीलता का जीता-जागता स्मारक है!

सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हो रही है। जिसमें एक लगभग बूढ़ा हो चुका व्यक्ति एक महिला को साइकिल पर ले जा रहा है तस्वीर देखकर कुछ लोग समझ रहे हैं कि महिला जिंदा है, व्यक्ति उसे इलाज के लिए ले जा रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि व्यक्ति साइकिल पर उस महिला की लाश लेकर जा रहा है।

क्या है मामला
ओडिशा के किसी गांव की घटना है जहां एक महिला की लाश को किसी ने इसलिए कंधा नहीं दिया क्योंकि मरने वाली महिला की बहन के पति ने दूसरी जाति में शादी कर ली थी। बहन के पति जिसका नाम चतुर्भुज है, उन्होंने पहली महिला से कोई बच्चा ना होने के कारण दूसरी शादी की। इसके बाद गांव वालों ने चतुर्भुज को बहिष्कृत कर दिया।

उस महिला की तबीयत आए दिन खराब रहती। हाल ही में उसे डायरिया हो गया था, उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था लेकिन वहां उसकी मौत हो गई। इसके बाद एम्बुलेंस ने उस महिला को चतुर्भुज के ही घर लाकर छोड़ दिया। इसके बाद यह मामला हुआ। उसके अंतिम संस्कार के लिए गांव का एक भी व्यक्ति देखने तक नहीं आया। फिर चतुर्भुज खुद एक साइकिल से महिला को शमशान घाट लेकर गया और उसका अंतिम संस्कार किया।

समाज के तौर पर कहां जा रहे हैं हम
इस तस्वीर के लिए किसको दोष दिया जाए, उस अस्पताल का जहां महिला की मौत हुई, उस व्यक्ति का जो साइकिल पर लेकर जा रहा है या फिर उन लोगों का जो महिला के अंतिम संस्कार को भी नहीं करा पाए। सोशल मीडिया पर आए दिन ऐसी तस्वीरें आती रहती हैं। जिसे देखकर कई बार हम सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि समाज के तौर पर हम सामूहिक रूप से कहां विफल हो रहे हैं। लेकिन बार-बार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं। इसके बाद भी हर बार हमें हताशा या निराशा ही मिलती है।

दरअसल, देश के कई ऐसे राज्य हैं जहां का सामाजिक ताना-बाना आज भी वहां की रूढ़िवादी परम्पराओं से बुना हुआ है, वहां ना समाज कि नैतिकता लागू होती है ना इक्कीसवीं शताब्दी की आधुनिकताओं की उपस्थिति है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की पहुंच आज भी वहां तक नहीं हो सकी है। हरियाणा के कई जिले, मध्य प्रदेश के पातालकोट सहित कई जगहों, छत्तीसगढ़ के कई जिले, तमाम ऐसी जगहें हैं जहां अभी भी परम्पराओं के सामने मानवता और विकास दम तोड़ता नजर आता है।

यह हमें तय करना है कि इतने बड़े क्षेत्रफल में फैले देश को एक साथ बराबरी पर ले चलना है या 100 साल बाद भी ऐसी ही तस्वीरों का सामना बार-बार करना है।

(तस्वीर और घटना एक सामाजिक संगठन के फेसबुक पोस्ट से साभार)

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