फ़लक से तोड़कर क़िस्सा ज़मीनी तौर पर कहनाबहुत मुश्किल है अब कुछ भी यक़ीनी तौर पर कहना. किसे चाहें किसे मानें किसे छू लें किसे […]
Tag: भवेश दिलशाद
हर सरहद को तोड़ ही देगी आज़ादी…
हर सरहद को तोड़ ही देगी आज़ादी दुनिया भर को घर कर देगी आज़ादी. दिल में रह-रह मौज उठेगी आज़ादी जान तो इक दिन लेके […]
ख़ुदकुशी…भवेश दिलशाद (शाद) की नज़्म
इसी इक मोड़ पर अक्सर गिरा जाता है ऊंचाई से अपनी ज़ात और ख़ाका मिटाया जाता है सब कुछ हो जिसमें ये सिफ़अत, क़ूवत कि जो अपना सके, जो घोल पाये सब कुछ अपने में
ग़मे-दिल और ग़मे जानां कहे बिन सह सके जो सब किसी इतनी बड़ी हस्ती के पहलू में किया जाता है सब कुछ गुम.
मिलती मुद्दत में है और पल में हँसी जाती है
आप की याद भी बस आप के ही जैसी है,
आ गई यूँही अभी यूँही अभी जाती है।
कभी तो सामने आ बे-लिबास हो कर भी
कभी तो सामने आ बे-लिबास हो कर भी, अभी तो दूर बहुत है तू पास हो कर भी. तेरे गले लगूँ कब तक यूँ एहतियातन […]