बर्थडे स्पेशल: उस्ताद नुसरत फतेह अली खान

अगर मौसिकी में सूफी कलाम और कव्वालियों को शामिल ना किया जाए तो संगीत का पूरा ताना बाना अधूरा सा लगने लगेगा. पिछले कुछ समय से एक गीत को कई तरीके से बदल बदल कर गाया जा रहा है. कहीं उसका रीमिक्स चल रहा होता है, तो कहीं किसी फिल्म में वही गीत नए तरीके से पेश किया जा रहा है. युवाओं में भी उस गीत का जबरदस्त क्रेज देखने को मिलता रहा है. उस गीत के डुप्लीकेट्स पर यूट्यूब पर लाखों करोड़ों हिट्स आते है. शायद ये गानों के इतिहास में पहली बार हुआ हो जब किसी गाने के इतने सारे वर्जन बने हों और वे सभी बड़े हिट साबित हुए हों. बात हो रही है ‘मेरे रश्के कमर’ की. ये गीत करीब चालीस बरस पहले कव्वाली के उस्ताद नुसरत फतेह अली खान ने गाया था.

https://www.youtube.com/watch?v=dIQGOnn7ruk

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज अजीम फनकार नुसरत फतेह अली खान का पूरा जीवन उनके संगीत की तरह सुरीला रहा. एक गीत के बहाने ही सही, आज के युवाओं में भी उनके संगीत का जादू सर चढ़ कर बोल रहा है.

आज नुसरत फतेह अली खान का जन्मदिवस है. फैसलाबाद के प्रसिद्ध कव्वाल घराने में जन्में नुसरत फतेह अली खान ने कव्वाली को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई. उनके बारे में कहा जाता है कि उनके पास कई घंटो तक सुरों से खेलने का अजीम फन था. मात्र सोलह बरस की उम्र में अपने वालिद और कव्वाल उस्ताद फतह अली खान के साथ मंच पर अपनी पहली पारिवारिक परंपरा कव्वाली गायन की कमान संभाली.

नुसरत फतेह अली खान ने दुनिया के करीब 40 देशों में अपनी गायिकी का जादू बिखेरा. वो ‘शहंशाह-ए-कव्‍वाली’ के नाम मशहूर हुए और करीब 125 एल्बम निकाले.

साल 1993, शहर शिकागो, विंटर फेस्टिवल की एक शाम थी. राक-कंसर्ट के बीच पहली बार क़व्वाली का रंग जमने वाला था. 20 मिनट की प्रस्तुति में उस कंसर्ट के श्रोताओं ने ऐसे संगीत को सुना जो कव्वाली के इतिहास में अमर हो गया. उनका जादू हमेशा के लिए अमेरिका और कई पश्चिमी देशों में छा गया. उसके बाद उन्होंने पीटर ग्रेबियल के साथ उनकी कई फिल्मों में अपनी आवाज दी. उनके साथ अपना एल्बम ‘शहंशाह’ भी निकाला.

नुसरत फतेह अली खान की विशेषता ये थी कि किसी भी संगीत, चाहे पूर्व का हो या पश्चिम का, उसे सूफियाना अंदाज़ में पेश करने का अजीम फन था. संगीत की सभी शैलियों को आजमाते हुए भी उन्होंने सूफियाना अंदाज़ नहीं छोडा. क़व्वाली को उन्होंने तो एक नया मुकाम दे दिया.

नुसरत फतेह अली खान ने कई हिंदी फिल्मों के लिए भी काम किया. उन्होंने शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन के लिए संगीत तैयार किया था. साल 2000 में आई फिल्म ‘धड़कन’ का मशहूर ‘दूल्‍हे का सेहरा’ गीत उन्होंने गाया. ये गीत आज भी भारतीय शादियों में झूमकर बजाया जाता है.

भारत की आजादी के 50वीं वर्षगांठ के मौके पर ए आर रहमान के साथ मिलकर ‘वंदे मारतम’ एल्‍बम के ‘गुरुस ऑफ पीस’ में अपना योगदान दिया. बाद में रहमान ने ‘गुरुस ऑफ पीस’ नाम से एक एल्बम जारी किया जिसमें नुसरत फतेह अली खान का ‘अल्‍लाहू’ भी रखा. 2007 में उन्होंने फिल्‍म गुरु में ‘तेरे बिना’ गाने को संगीतबद्ध कर उन्हें याद किया.

जावेद अख्तर के साथ भी उन्होंने काम किया. संगम नाम के एल्बम में इस जोड़ी ने एक से बढ़कर एक गीत दिए.
1997 में जब नुसरत फतेह अली खान ने दुनिया को अलविदा कहा तो पाकिस्तान ने कहा कि उसने अपना सबसे अनमोल रत्न खो दिया. नुसरत फतेह अली खान की खानदानी परंपरा को आगे बढ़ा रहे राहत फतेह अली खान बचपन के दिनों से ही मंचों पर उनके सुर में अपने सुर मिलाते दिख जाते थे. उन्होंने नुसरत फतेह अली खान के कई बेमिसाल गीतों को फिर से अपनी आवाज में गाया है. मौसिकी के इस महान शख्सियत के अंदाज-ए-सुरूर और आवाज के खनकपन की आज भी दुनिया दीवानी है.

‘ये जो हल्का हल्का सुरूर है’, ‘आफरीं आफरीं’ ‘एक दिन वो जरूर आएंगे’, ‘कहते हैं किसको दर्द-ए-मोहब्बत’, ‘तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी’ ‘सोचता हूं कि वो कितने मासूम थे’, ‘मेरे रश्के कमर’, ‘फिरूं ढूंढता मयकदा’ जैसी कव्वालियां आज भी उनके संगीत प्रेमियों के होठों पर राज करती हैं.

 

 

https://www.youtube.com/watch?v=nWouEOTDap4

 

https://www.youtube.com/watch?v=voZ2wCrsS6M

 

https://www.youtube.com/watch?v=58I2bDX-JIk

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