राजीव गांधी ने जो श्रीलंका में किया मोदी वही मालदीव में करेंगे?

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मालदीव में सत्ता और न्यायालय के टकराव के बाद स्थिति गंभीर है। मालदीव का विपक्ष और कोर्ट भारत से मदद की उम्मीद लगाए बैठा है। द टाइम्स ऑफ इंडिया ने सूत्रों के हवाले से खबर छापी है कि भारत की सेना को आदेश दिए गए हैं कि वह मालदीव रवाना होने के लिए तैयार रहे। हालांकि, अभी तक भारत ने आधिकारिक तौर पर इस तरह की किसी प्रतिक्रिया की बात नहीं कही है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर

इससे पहले भी 1988 में भारत ने मालदीव में सेना भेजकर तमिल अलगाववादियों की मदद से हो रही सत्तापलट की कोशिश को नाकाम किया था। उस समय भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। वही प्रधानमंत्री राजीव जिन्हें तमिलों के हक की लड़ाई के नाम पर बने एक संगठन ने अपना दुश्मन मान लिया और उनकी हत्या कर दी। श्रीलंका में जहां हक की लड़ाई थी तो मालदीव में तमिल लोग खुद को सत्ता में लाना चाहते थे। इस बार बेशक लड़ाई तमिलों की नहीं है लेकिन भारत से तो सैन्य मदद ही मांगी जा रही है। सैन्य कार्रवाई का असर जानना हो तो श्रीलंका में तमिलों का इतिहास उठा लीजिए सब समझ आ जाएगा। यह कहने में कितना भी अच्छा और गौरवशाली लगता हो लेकिन जमीन पर बेहद वीभत्स होता है।

इंडिया टू मालदीव वाया श्रीलंका

भारत के मालदीव और श्रीलंका से संबंधों में एक चीज कॉमन दिखती है और वह हैं ‘तमिल’। राजीव गांधी ने एक बार तो इन तमिलों के हक की रक्षा की बात की लेकिन बाद में कुछ ऐसा हुआ कि तमिलों के नाम पर बने संगठन लिट्टे ने राजीव को अपना दुश्मन मान लिया और वह दोबारा सत्ता में ना आएं इसलिए उनकी हत्या कर दी। राजीव ने जहां श्रीलंका में पीस कीपिंग फोर्स भेजी थी वहीं 1988 में मालदीव में तमिलों द्वारा की गई तख्तापलट की कोशिश को ऑपरेशन कैक्टस चलाकर नाकाम किया था, जिसकी तारीफ दुनिया भर में हुई।

आज के मालदीव और 1988 के मालदीव में फर्क इतना हो गया है कि तब मालदीव के राष्ट्रपति ने भारत से मदद मांगी थी और आज राष्ट्रपति के खिलाफ मदद की गुहार हो रही है। भारत के दोस्त रहे मालदीव के वर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन काफी कूटनीतिक राजनेता हैं और फायदा देखकर कभी चीन तो कभी भारत के साथ होते रहते हैं। चीन भी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स मिशन के तहत मालदीव को हर हाल में साथ रखना चाहता है। मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति और वर्तमान विपक्ष के नेता मोहम्मद नशीद भारत की तरफ ‘झुकाव’ रखते हैं शायद इसी ऐंगल से सोचकर भारत मालदीव में सैन्य कार्रवाई की तैयारी में है। हालांकि, श्रीलंका के वर्तमान राष्ट्रपति को अपना समझ समर्थन करने वाला भारत देख रहा है कि वह भी चीन से दूर नहीं हैं। ऐसे में नशीद भी भारत के होंगे ऐसा सौ फीसद विश्वास नहीं हो सकता।

पूरे सीन में मोदी कहां हैं?

मालदीव की लगभग 4.5 लाख की जनसंख्या में 35,000 से ज्यादा लोग भारतीय हैं। पीएम नरेंद्र मोदी इस छोटे से देश में अपनी सेना भेजकर सैन्य कार्रवाई करने से चूकना तो बिल्कुल नहीं चाहेंगे। क्योंकि भारत का इतिहास कहता है कि सैन्य कार्रवाइयों और युद्धों का इनाम शासकों को प्रसिद्धि के रूप में हमेशा मिला है। इंदिरा गांधी ने 1971 में बांग्लादेश में पाकिस्तान को हराकर अपना नाम इतिहास में दर्ज करवा दिया। अब तक ऐसे मौके कांग्रेस को ही मिले हैं, जाहिर है लंबे समय तक सत्ता में टिकने का सपना देख रही बीजेपी और उसके कर्ता-धर्ता मोदी भी इसको हाथ से जाने नहीं देंगे। लेकिन यहां सतर्क रहना चाहिए कि कहीं मालदीव भी श्रीलंका ना बन जाए।

हालांकि, अब भी सैन्य कार्रवाई से इतर किसी अन्य विकल्प की तलाश जल्द ही की जानी चाहिए। वरना छोटा सा यह देश कब सीरिया और इजरायल बन जाएगा पता भी नहीं चलेगा।

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