आर्टिकल 370 पर शोर करके बेवकूफ बना रहे हैं कश्मीरी नेता?

कश्मीर के लिए 4 अगस्त 2019 की तारीख ऐतिहासिक थी. ठीक वैसी ही एक तारीख 15 अक्टूबर 2020 भी है. इन दोनों तारीखों पर एक जैसी मीटिंग हुई. मीटिंग का अजेंडा भारतीय संविधान का आर्टिकल 370 ही था. दोनों तारीखों में अंतर सिर्फ इतना है कि 4 अगस्त 2019 को आर्टिकल 370 प्रभावी था. लेकिन आर्टिकल 370 अब प्रभावी नहीं है. इसका मतलब है कि जम्मू-कश्मीर को मिला विशेष राज्य का दर्जा छिन चुका है. जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांटा जा चुका है. ये दो हिस्से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हैं. दोनों ही क्षेत्र अब केंद्र शासित प्रदेश हैं. इसमें से लद्दाख में अब विधानसभा नहीं है. इसका मतलब है कि सिर्फ जम्मू-कश्मीर में ही चुनाव होगा.

लोकल डिब्बा को फेसबुक पर लाइक करें।

फिर से दिल्ली बनाम कश्मीर?

कोरोना के चलते जम्मू-कश्मीर में चुनाव न कराने का एक और बहाना मिल गया है. ताजा हालात ये हैं कि फारूक और उमर अब्दुल्ला के बाद अब महबूबा मुफ्ती भी रिहा हो गई हैं. लगभग 14 महीने तक कैद रहने के बाद महबूबा मुफ्ती रिहा हुईं. आर्टिकल 370 हटाने और 35A के बारे में लगातार आवाज उठा रहे अब्दुल्ला पिता-पुत्र तुरंत महबूबा मुफ्ती से मिलने पहुंचे. इस बात ने एक संदेश दिया कि एक बार फिर हम उसी मुहाने पर खड़े हो गए हैं, जहां दिल्ली बनाम कश्मीर होगा.

जरूरी है असली मुद्दों की लड़ाई

15 अक्टूबर 2020 को फारूक अब्दुल्ला के घर पर हुई एक मीटिंग में कई पार्टियों के नेताओं ने हिस्सा लिया. इस मीटिंग में एक बार फिर वही तय किया गया, जिससे शायद कुछ ठोस हासिल नहीं होना है. कश्मीर में आर्टिकल 370 के अलावा भी कई बड़ी समस्याएं हैं. मेरा मानना है कि एक बार फिर से आर्टिकल 370 की लड़ाई में उलझने से कश्मीर और पीछे ही होता जाएगा. मेरी राय में कश्मीर के स्थानीय नेताओं को भी राज्य के लोगों के लिए रोजगार, बेहतर शिक्षा, उद्योग और आधारभूत ढांचे की लड़ाई लड़नी चाहिए.

जनता के लिए आर्टिकल 370 नहीं नौकरी है जरूरी

प्रैक्टिकली सोचें तो आर्टिकल 370 होने या ना होने से आम जनता को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है. अगर महबूबा मुफ्ती या फारूक अब्दुल्ला इसे फिर से लागू कराने की बात कहें तो यह भी लगभग असंभव है. हां, पूर्ण राज्य की बात वाजिब है. लोकतांत्रिक तरीके से समस्या का हल निकालने की कोशिश वाजिब है. लेकिन इसके लिए आर्टिकल 370 और 35A पर उलझना नहीं है.

आर्टिकल 370 भी नहीं रहा, आखिर कब बंद होगी कश्मीरी पंडितों की हत्या?

कश्मीर के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशना जरूरी

कश्मीर में नौकरी सबसे बड़ी समस्या है. अगर टूरिज्म को छोड़ दें तो कश्मीर के पास ज्यादा कुछ बचता नहीं है. खेती भी मौसम पर ही निर्भर है. ऐसे में सरकारों को राज्य में नौकरी देने, लोगों को जोड़ने, बच्चों और युवाओं को बेहतर शिक्षा कश्मीर में ही देने पर फोकस करना चाहिए. 370 के लिए लड़ना सिर्फ वही पुरानी लकीर पीटने जैसा है, जिससे नेता लोग जनता को सिर्फ बेवकूफ बनाएंगे.

इस लेखक के और लेख

uddhav

हिंदुत्व और मराठी के नाम पर पीटने वाले सचमुच सेक्युलर हो गए?

mahendra singh dhoni

सुषुप्त ज्वालामुखी होते जा रहे हैं महेंद्र सिंह धोनी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हमारा Youtube चैनल

पुराना चिट्ठा यहां मिलेगा

March 2026
S M T W T F S
1234567
891011121314
15161718192021
22232425262728
293031