बिहार परिवहन: जाति की गाड़ी और ‘सुशासन’ का पहिया

आजादी के इतने सालों के बाद भी व्यवस्था लाख दावे करे लेकिन वह जाति व्यवस्था को कमजोर नहीं कर सकी है। अगर दूसरे शब्दों में कहा जाए तो व्यवस्था ही जाति आधारित राजनीति की अप्रत्यक्ष रूप से पोषक है। समय के साथ यह व्यवस्था धीरे-धीरे विघटनकारी होती जा रही है। दुर्भाग्य से यह देश के कई राज्यों में अपने पैर काफी मजबूती से जमा चुका है।

 

बिहार भी उन राज्यों में से एक है। बिहार की राजनीति में जाति-व्यवस्था इतनी घुल-मिल गई है कि कोई भी नीति और रणनीति जाति और वर्ग को ध्यान में रख कर बनाई जाने लगी है। इस राजनीति के पुरोधा बनकर उभरे हैं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उर्फ-सुशासन बाबू। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने पिछड़ा वर्ग के अंदर अतिपिछड़ा और दलित वर्ग के अंदर महादलित वर्ग बना डाला। शासन की बागडोर तो उनके हाथों में है इसलिए सशक्तिकरण के नाम पर चाबुक चला रहे हैं। सबका समय आता है, अभी इनके सितारे बुलंद हैं, जब समय लदेगा, तब जाएंगे तिहाड़ में बिहार करने के लिए।

 

इस दौर में एक कड़ी और जुड़ गई है। स्थिति यह है कि आर्थिक सशक्तिकरण के नाम पर वर्ग-विशेष को ध्यान में रख कार्यक्रम बनाया गया है। अभी हाल में ही बिहार सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए ‘मुख्यमंत्री ग्राम परिवहन योजना’ की घोषणा की। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में परिवहन व्यवस्था को सर्व सुलभ करना बताया गया है। इसके पीछे तर्क दिया गया है कि इस कार्यक्रम से कमजोर वर्गों के बेरोजगार युवक-युवतियों के लिए रोजगार का सृजन करने में सहायता मिलेगी।

 

अब प्रश्न उठता है कि बेरोजगारी समुदाय विशेष को ही प्रवाहित नहीं करती है। इस रोग का बस एक ही इलाज है और वह है रोजगार मुहैया कराना। खैर जो भी हो आने वाले समय में यह देखना लाजमी होगा कि यह कार्यक्रम कितना सफल होता है। ग्रामीण परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त करने के नाम पर सरकारी खजाने के लूट का जरिया न बन जाए।


यह लेख अविनाश मिश्रा ने लिखा है।

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