क्या अराजकता को बीजेपी से जोड़ना ट्रेंड बन गया है?

लगता है बीएचयू और शांति दो विपरीत ध्रुव हो गए हैं,जो अब कभी एक साथ नहीं हो सकते है। बीएचयू एक बार फ़िर विवादों में घिर गया है।इस बार विवाद की जड़ है नाथूराम गोडसे का मंचन किया जाना। आरोप है कि कला संकाय के वार्षिकोत्सव कार्यक्रम “संस्कृति 2018” में कुछ छात्रों ने नाथूराम गोडसे पर नाटक का मंचन किया है, जिसमें खुलेआम नाथूराम गोडसे का महिमामंडन किया गया है, इसी को लेकर कुछ छात्रों ने बीएचयू प्रशासन के ख़िलाफ़ लंका थाने में शिकायत दर्ज कर मांग की है कि आरोपियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई क्योंकि इस तरह का आयोजन खुलेआम संविधान का उल्लंघन है।

इसी बीच शिकायत करने वाले छात्र जिसका नाम अविनाश ओझा बताया जा रहा है, उसके साथ मारपीट की गई है और अविनाश ने कुछ छात्रों के ख़िलाफ़ नामजद शिकायत दर्ज करवाई है। पुलिस अपना काम करती, इससे पहले ही इस मामले को राजनीतिक रंग देना शुरू हो गया है।

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विवाद में नया मोड़ तब आया जब मारपीट करने वाले लोगों को सीधे बीजेपी और आरएसएस से जोड़ दिया गया, जैसे ये लोग बीजेपी और आरएसएस का झंडा लेकर वहां पर गए हुए थे। यहां सवाल बनता है कि किसी भी दो गुटों की लड़ाई को किसी ख़ास दल और विचारधारा से कैसे जोड़ा जा सकता है? बीजेपी के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने भी इसकी निंदा की है और इसमें शामिल होने से साफ इनकार किया है।

आजकल किसी भी अराजक काम को बीजेपी और आरएसएस से जोड़ना एक ट्रेंड बन गया है। फाँसी की सजा से लड़ने के नारे पर अपनी जमीन बचाने की कोशिश कर रहा वामदल क्या वाकई में फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ है? स्तालिन से बड़ा आतंकी, तानाशाह, फ़ासीवादी कौन होगा? और अगर वामदल उसे अपना आदर्श मानते हैं तो फिर क्या वामदल भी फ़ासीवादी हैं? क्या उसे भी फ़ासीवाद के परस्पर खड़ा करना उचित रहेगा?

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आम आदमी पार्टी का कोई नेता अगर यौन उत्पीड़न करते मिलता है तो क्या उससे उसकी पार्टी से तुलना करना उचित है? अगर कांग्रेसी नेता अय्यर पाकिस्तान परस्त है तो क्या कांग्रेस को पाकिस्तान परस्त कहना उचित है?

अगर ये ठीक नहीं है तो मारपीट की घटना को बीजेपी और आरएसएस से क्यों जोड़ा जा रहा है? ये भी तो सही नहीं है? विगत दो वर्षों में आरएसएस बीजेपी पर निराधार आरोप लगने शुरू हो गए हैं। ये ऐसी मानसिकता है जिस वजह से देश में इमरजेंसी लगी थी। ये विचारधारा देश से विपरीत विचारधारा को ख़त्म करने वाली है। हमें इससे सतर्क रहना चाहिए।

क्या गनीमत नहीं ये आजादी
सांस लेते है, बात करते है

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