बेघर होने की राह पर 10 लाख आदिवासी! दोष किसका?

सुप्रीम कोर्ट ने 10 लाख से अधिक आदिवासियों को जमीन से बेदखल करने का आदेश दिया है। आदिवासी समुदाय पर आए इस फैसले से मुझे कोई हैरानी नहीं है क्योंकि यह तय था और इस बात का सबसे बड़ा सबूत कुछ और नहीं सरकार का 2006 में बनाया कानून ही है। यह बात कोई हवा में नहीं बोल रहे हैं हम।

 

2006 के इस कानून में कहा गया था कि आपको यह साबित करना होगा कि आप 75 साल से यहां रह रहे हैं। 13 Dec 2005 के 75 साल पहले से मतलब कि 1930 से आप उसी स्थान पर रह रहे हैं। विडंबना है कि देश 1947 में आजाद हुआ लेकिन आप दूसरे से 1930 तक के सबूत मांग रहे हैं। यही ना सबित कर पाने के आधार पर कई दावे खारिज हुए। अब आप खुद सोचिए कि जो सरकारें जंगल का दोहन करना चाहती हैं, वे इनके किए गए दावों को गलत तरीके से खारिज क्यों नहीं कर सकती हैं। कोर्ट ने फैसला कानून के हिसाब से दिया है लेकिन महाराज कानून तो सरकार बनाई है ना!

 

जंगल की हकदारी, राजनीति और संघर्ष

गलती वर्तमान सरकार ने भी की है। आइए जानते हैं कि वह गलती क्या है। दरअसल, सरकार ने कानून के बचाव के लिए जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस इंदिरा की पीठ के समक्ष 13 फरवरी को अपने वकीलों को ही नहीं भेजा और इसी वजह से पीठ ने राज्यों को आदेश दे दिया कि वे 27 जुलाई तक उन सभी आदिवासियों को बेदखल कर दें, जिनके दावे खारिज हो गए हैं। इसके साथ ही पीठ ने इसकी एक रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में जमा करने को भी कहा। आपको लग रहा होगा सरकार कहां-कहां ध्यान दे, पाकिस्तान पर दे या इन लोगों पर तो इस पर एक बात और बता देते हैं। कोर्ट का जो आदेश है, वह आज का नहीं है। यह लिखित आदेश तो 20 जनवरी को जारी हुआ है। अब आप ही बताओ कि सरकार क्या कभी इनको बचाना भी चाहती थी?

 

इस पर राहुल गांधी एक ट्वीट करते हैं, ‘बीजेपी सुप्रीम कोर्ट में मूक दर्शक बनी हुई है, जहां वन अधिकार कानून को चुनौती दी जा रही है। वह लाखों आदिवासियों और गरीब किसानों को जंगलों से बाहर निकालने के अपने इरादे का संकेत दे रही है। कांग्रेस हमारे वंचित भाई-बहनों के साथ खड़ी है और इस अन्याय के खिलाफ पूरे दम से लड़ाई लड़ेगी।’ राहुल के इस ट्वीट पर बस इतना ही बोलना है कि राहुल बाबा कानून 2006 में पास हुआ है। उस समय ही कानून को ठीक कर लेते तो आज आप यह ट्वीट न करते। राहुल बाबा एक और बात बता देते हैं, ‘शोधकर्ता सीआर. बिजॉय के प्रकाशित शोध के अनुसार, साल 2002-04 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जब आखिरी बार देशभर में जनजाति समुदायों को बेदखल करने का काम हुआ था तो मध्य भारतीय जनजाति वन इलाकों में हिंसा, हत्याओं और विरोध प्रदर्शनों की अनेक घटनाएं सामने आई थीं और लगभग तीन लाख निवासियों को अपना स्थान छोड़ना पड़ा था।’

 

आदिवासी पहले भी बेदखल हुए हैं और आगे भी होगें, क्योंकि हमारी आर्थिक नीति ही इनके खिलाफ है। एक बात यह भी है कि हमारे राजनीतिक दल तभी इनके साथ खड़े होते हैं, जब वे विपक्ष में होते हैं। जैसे ही वे सत्ता में आते हैं, वे बदल जाते हैं क्योंकि हम हर पांच साल बाद सरकार भले बदल रहे हैं लेकिन हम अपनी आर्थिक नीतियों में कोई सुधार नहीं कर रहे हैं। आप भी यह बात जान लीजिए कि जब तक ये सुधार नहीं होंगे, तब तक कुछ बदलने वाला नहीं है। आज 10 लाख बेदखल हुए हैं! देखते रहिए कल कितने होते हैं क्योंकि हम जंगलों का दोहन तो करेंगे ही और अगर दोहन करना है तो किसी को तो कीमत चुकानी ही होगी।

 

अंत में गांधी की एक लाइन जो इसका सार भी है कि ‘धरती पर सभी की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, उनके लालच के लिए नहीं’ आप सब जानते हैं कि कौन लोग हैं, जो आज लालची बने बैठे हैं।

अभय

अभय पॉलिटिकल साइंस के स्टूडेंट रहे हैं। वर्तमान में पॉलिटिकल लव से उनकी पहचान बन रही है। राजनीतिक और सामाजिक विषयों को ह्यूमर और इश्क के साथ पेश करना अभय की कला है।

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