रैलियों की भीड़ दिखाती है कि जनता कोरोना पर कितनी गंभीर है

कोरोना जानलेवा है. यह नारा था. मार्च और अप्रैल 2020 में. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित किया. पूरा देश लॉकडाउन में रहा. लॉकडाउन के चलते घर न जा पा रहे लोग पैदल चल पड़े. रास्ते में लाठी खाई. केस दर्ज हुए. पुलिसिया बर्बरता भी हुई. कहीं तो सैनिटाइजर से ही नहला दिया गया. यह सब देखने वाला देश आज चुनाव का जश्न मना रहा है. जिस जनता को घरों में कैद किया गया था, वही जनता रैलियों में लहालोट हो रही है. हर पार्टी के नेता बिना मास्क लगाए इधर-उधर कूद रहे हैं और जनता भी.

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लाचार थे लोग और सरकारें मज़ा ले रही थीं

शायद जनता बहुत जल्दी भूल जाती है. इसी बिहार के लोग मुंबई, दिल्ली और न जाने कितने प्रदेशों में फंसे थे. कई नेकदिल लोगों ने अपने पैसों से लोगों को खाना खिलाया. घर भेजने का इंतजाम किया. उस वक्त यही पार्टियां आरोप-प्रत्यारोप खेल रही थीं. स्वास्थ्य को लेकर बड़ी-बड़ी डींगें हांकी जा रही थीं. पापड़, गोबर और न जाने कैसे-कैसे तर्क दिए जा रहे थे. आखिर सबको कोरोना हुआ. लाखों लोगों की जान गई. सब हुआ लेकिन चुनाव नहीं रुका.

चुनाव के बाद ना नेता दिखेंगे, ना हेलिकॉप्टर

रैलियों का हाल देखिए. नेताजी तो हेलिकॉप्टर से आए. फिर भी कई नेता कोरोना संक्रमित हुए. कवरेज के लिए गए कई पत्रकार कोरोना संक्रमित हुए. इस बीच हजारों की संख्या में लोग एक-दूसरे से सटे हुए खड़े रहे. रैली में कोई हेलिकॉप्टर देखने आया तो कोई नेता को. क्योंकि चुनाव के बाद न नेता दिखेंगे और न ही इतने करीब से हेलिकॉप्टर. इसलिए लोगों ने जान भी जोखिम में डाली.

यह भी पढ़ें- कोरोना से जंग में नाकाम हैं सरकार, पुलिस जनता के पीछे लगी 

महामारी के बाद भी नहीें जागे लोग

सोशल डिस्टैंसिंग, मास्क और सैनिटाइजेशन तो भूल जाइए. लोगों को यही नहीं याद है कि उन्हें सरकार क्यों चुननी थी. सरकार ने क्या किया और सरकार को क्या करना चाहिए. लोग अपनी-अपनी जाति, धर्म और पार्टी के हिसाब से लगे हुए हैं. इन सबके बीच स्वास्थ्य सेवाओं, स्वास्थ्य बीमा, अस्पतालों की हालत और स्वास्थ्य सुविधा के लिए जरूरी मूलभूत ढांचे की कोई चर्चा नहीं है.

अगली महामारी का इंतजार

कोरोना महामारी में अमेरिका, चीन और इटली जैसे देश तबाह हो गए. हम फिर भी कोरोनिल लेकर खुश हैं. सुधार के इतने बड़े मौके के बावजूद स्वास्थ्य सेवाएं जस की जस रहीं. सब कुछ रुका लेकिन चुनाव नहीं. नेता खूब उड़े और वादे भी. अब देखना ये है कि हम फिर से ऐसे ही परेशान होने के लिए ऐसी किसी महामारी का इंतजार करेंगे या रैलियों में ही लहरिया लूटते रहेंगे.

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