Tag: लोकल डिब्बा
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जल संरक्षण समय की जरूरत
जल ही जीवन है। यह बात कई दशकों से हम कहते एवम सुनते आ रहे हैं। जल हमें प्रकृति से एक उपहार के रूप में मिला है। पृथ्वी का तीन चौथाई हिस्सा पानी से घिरा हुआ है 30 फिर भी आज स्वच्छ जल की उपलब्धता एवम पानी का लगातार गिरता स्तर भारत सहित वैश्विक स्तर…
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विश्व टेलिविजन दिवस: बचपन में टीवी देखने किसके यहां जाते थे?
अब के बच्चों के लिए टीवी पर दर्जनों कहानियां हैं. इतनी कि वो जिन्हें चाहें देख-सुन सकते हैं, छोड़ सकते हैं और कोई पसंद न आए तो अपने मिजाज से पैकेज ले सकते हैं लेकिन उनके पास शायद ही टीवी की अपनी कोई कहानी हो, वो कहानी जिसमें टीवी महज एक सूचना और मनोरंजन का…
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पॉलिटिकल लव: कहां लिखा है कि प्यार में चॉकलेट देना ही है?
अच्छा ये कहां लिखा है कि प्यार में चॉकलेट देना ही है! लिखा तो ये भी नहीं है दिल्ली देश की राजधानी है! हाहाहाहा, ये भी सही बोली तुम तो लाओ मेरी चॉकलेट बिना सवाल किए हुए। तुम हर बार मेरी अक्स का मुद्दा लेकर बैठ जाती हो, अरे तो तुमने कांड ही इतने किए…
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प्रदूषण का ‘होम्योपैथी’ इलाज जरूरी है
अक्टूबर बीत गया अब नवंबर की शुरुआत हो चुकी है, नवंबर की शुरुआत के साथ ही दिल्ली, एनसीआर और हरियाणा-यूपी के निकटवर्ती जिलों में काली धुंध का आगमन शुरू हो गया है। आकाश में ये घने काले धुंध का आना कोई नयी बात नहीं हैं क्योंकि ये तो हर साल आते हैं हाँ लेकिन ये…
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विद्या बालन का फिल्म प्रमोशनल नारीवाद
विद्या बालन का हालिया बयान उस समय तक एकदम सच लग रहा था, जब तक यह नहीं पता था कि उनकी फिल्म भी आने वाली है। पता चली कि विद्या की फिल्म ‘तुम्हारी सुलु’ रिलीज होने वाली है। विद्या फिल्म के प्रमोशन के सिलसिले में या यूं कहें ट्रेंड फॉलो करते हुए तथाकथित रूप से…
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पॉलिटिकल लव: चलो प्यार में पैराडाइज चलते हैं…
तो तैयार हो न तुम? क्यों तुम कोई बड़ा बदलाव करने वाली हो क्या प्यार में? सोच रही हूँ कुछ बदल ही लेते हैं अपने इस प्यार में.. अरे, रहने दो पिछले साल जो बदली थी वो आज तक भुगत रहे हैं… हाहाहा, देखो कुछ तो करूँगी ही नवंबर आ गया है देखो जो भी…
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बाजार के फेफड़े तो धुंए से ही हरे होते हैं
“हवा के दोश पे उड़ती हुई ख़बर तो सुनो हवा की बात बहुत दूर जाने वाली है” —हसन अख्तर जलील आज बाजार किसी भी हालात को नहीं छोड़ता, वो चाहे बारिश हो या बाढ़, आग हो या पानी बाजार अपनी जगह बना ही लेता है। दिल्ली आज दिलवालों की नहीं धुआं वालो की हो गई…
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घास इन कोठेवालियों की दूर की रिश्तेदार है
जैसे बिन बोए उग आती है घास जमीन के हर हिस्से पर ठीक वैसे ही कुछ लड़कियां उगती हैं शहर की हर गली – हर नुक्कड़ से घास की तरह इनका हरापन तुम्हें ललचाता तो है मगर तुम इन्हें घर से दूर ही रखते हो क्योंकि हर हरी चीज गमले में नहीं लगाई जाती। ये…
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लप्रेक: एक ऑफलाइन मुलाकात
आज जब तुम मिली तो पता नही क्यों फेसबुक और व्हाट्सऐप की डीपी से ज्यादा सुन्दर लगी ? शायद वास्तविकता की यही खूबसूरती है। वहाँ तो तुम्हे देखकर झटपट लाइक कर दिया करता था, मगर आज मुझे तुम्हें देखना है, देखना है तुम्हारे चेहरे को जिसमें जिंदगी के फिल्टर्स साफ नज़र आ रहे हैं (…