कभी तो सामने आ बे-लिबास हो कर भी

कभी तो सामने आ बे-लिबास हो कर भी,
अभी तो दूर बहुत है तू पास हो कर भी.

तेरे गले लगूँ कब तक यूँ एहतियातन मैं,
लिपट जा मुझ से कभी बद-हवास हो कर भी.

तू एक प्यास है दरिया के भेस में जाना,
मगर मैं एक समुंदर हूँ प्यास हो कर भी.

तमाम अहल-ए-नज़र सिर्फ़ ढूँढते ही रहे,
मुझे दिखाई दिया सूरदास हो कर भी.

मुझे ही छू के उठाई थी आग ने ये क़सम,
कि ना-उमीद न होगी उदास हो कर भी.

(मशहूर शायर भवेश दिलशाद पेशे से पत्रकार हैं और फिलहाल न्यूज18 हिंदी में कार्यरत हैं.)

इस लेखक के और लेख

सोनचिड़िया रिव्यू: चंबल की ऐसी कहानियां जिन्हें दिखाने के लिए कई पीढ़ियां गुज़र गईं

नज़्म ‘औरत’: माथे पर लिखी मेरी रुसवाई नहीं जाती

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हमारा Youtube चैनल

पुराना चिट्ठा यहां मिलेगा

April 2026
S M T W T F S
 1234
567891011
12131415161718
19202122232425
2627282930