जनवादी पत्रकारिता को तिलांजलि दे चुकी है मेन स्ट्रीम मीडिया

गुज़रा महीना समाचार और ख़बरों के बाज़ार के लिए बड़ा सीजन रहा क्योंकि साल का सबसे बड़ा ख़ुराक मीडिया को गुरमीत रामरहीम के नाम पर मिला. बहुत सारे पत्रकारों को ग्राउंड रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला और रिटायर होने के बाद अपने बच्चे और पत्रकार बनना चाह रहे बच्चों को सुनाने योग्य कहानी भी मिल गई.

वैसे देश में बहुत सारी घटनाएं घटी और उनमें से बहुत सी जनवादी ख़बरें भी थीं. मीडिया और पत्रकार चाहते तो इन घटनाओं में खुद को जनवादी साबित कर सकते थे, लेकिन वे तो बस हनी प्रीत के पीछे हैं.  मीडिया में ख़बर आई कि बाबा राम रहीम की तबियत ख़राब है फिर क्या डॉक्टर का झुण्ड जेल पहुंच गया जांच करने. डॉक्टर ने बाहर आकर बताया कि “बाबा इज सेक्स एडिक्ट.” तब क्या मीडिया के कान खड़े हो गए और हजारों जगह यह ख़बर छप गई कि “बाबा इज सेक्स एडिक्ट.”

नर्मदा, गोरखपुर, बीएचयू और रोहिंग्या जैसी महत्वपूर्ण ख़बरें छोड़ मीडिया लग गया हनीप्रीत के पीछे. अगर कोई खोजी पत्रकारिता हो रही हो, तो मान भी लें, पर बात तो सिर्फ इतनी है कि बाबा हनी प्रीत के लिए परेशान है. मीडिया में मैंने एक ख़बर देखी, जिसमें लिखा था कि बाबा रामरहीम हस्तमैथुन करते हुए पकड़ा गया. वाह वाह वाह! क्या यह आश्चर्यचकित करने वाली बात है. सेक्स एक ज़रूरत है. मनुष्य का हस्तमैथुन करना स्वाभाविक है. इसमें कोई बुराई भी नहीं. बाबा सेक्स एडिक्ट हो न हो, बाबा हनीप्रीत के साथ सेक्स न कर पाने के चलते हस्तमैथुन कर रहे थे कि नहीं? हनीप्रीत का लौटना ही अब भारतीय मीडिया और पत्रकारों को जनवादी ख़बरों की तरफ़ मोड़ सकता है।

 

( यह आलेख प्रशांत कन्नौजिया ने लिखा है। प्रशांत दी वायर हिंदी में पत्रकार हैं।)

नोट: यह लेखक के स्वतंत्र विचार हैं.

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