‘कप्तान खान’ अगर ‘फौजी खान’ नहीं बने तो पाकिस्तान का बदलना तय!

‘रोक सको तो रोक लो तब्दीली आई रे, तब्दीली आई रे, पीटीआई रे’
ऐसे कई दिलचस्प नारे पाकिस्तान के इन आम चुनावों के दौरान पाकिस्तानी टीवी चैनलों पर देखने को मिले. और चुनावों की जिस दिन गिनती हो रही है, पकिस्तान तहरीके इंसाफ सरकार बनाने की दहलीज पर पहुंच गई है.

दरअसल, क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान का पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनना पकिस्तान में बहुत बड़ा परिवर्तन होगा. हालांकि इमरान खान को यहां पहुंचने में करीब 22 साल लग गए.

वो साल 1992 था जब इमरान खान की कप्तानी में पकिस्तान क्रिकेट का विश्व चैम्पियन बना था. इसके बाद वे कप्तान खान के नाम से पूरे पाकिस्तान में प्रसिद्द हुए. साल 1996 में इमरान खान ने राजनीति में कदम रखा और अपनी खुद की पार्टी बनाई. उसके बाद इमरान खान लगातार सक्रिय रहे. कभी अपने राजनीतिक बयानबाजियों की वजह से तो कभी अपने रंगीन कारनामों की वजह से चर्चा में रहा. हाल ही में उन्होंने तीसरी शादी रचाई. इसकी भी खूब चर्चा रही.

पाकिस्तानी राजनीति का इतिहास उठा कर देखें तो सिर्फ गिने चुने नाम आएंगे जो जननेता के रूप में उठकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने हो. और ये तय के अब उस इतिहास में इमरान खान का नाम सबसे ऊपर लिखा जाएगा

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि वे अब पाकिस्तान मुल्क की कप्तानी करने जा रहे हैं. उस मुल्क की कप्तानी जो अपने जन्म के बाद से ही हमेशा विवादों में रहा, और वो विवाद आतंकवाद और फौज के इर्द गिर्द रहा. कभी आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप में पूरे विश्व में उसकी किरकिरी हुई तो कभी फौज ने सरकार का तख्ता पलट कर सत्ता हथियाई.

पाकिस्तान की राजनीति बीते सात दशकों में धर्म, आतंकवाद और फौज तक सिमट कर रह गई. वरना आज पूरे विश्व में पाकिस्तान की धमक कुछ और होती. अब पाकिस्तान इमरान खान के हाथों में जा रहा है. ये पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ा बदलाव है. पाकिस्तानी राजनीति का इतिहास उठा कर देखें तो सिर्फ गिने चुने नाम आएंगे जो जननेता के रूप में उठकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने हो. और ये तय के अब उस इतिहास में इमरान खान का नाम सबसे ऊपर लिखा जाएगा.

लेकिन इमरान खान के पास चुनौतियां का जखीरा है. पकिस्तान की राजनीति में वहां की सेना का बहुत ही बड़ा दखलरहा है. यहां तक कहा जाता है कि सत्ता की असली चाबी सेना के पास ही रहती है. इमरान खान पर भी आरोप लग रहे हैं कि वो फौज से मिले हुए हैं. लेकिन खास बात ये है कि ये अभी आरोप ही हैं, क्योंकि इमरान खान के कद और लोकप्रियता के सामने फौज का सबसे ताकतवर व्यक्ति भी हाल फिलहाल में नहीं टिक सकता है.

इमरान खान के कद और लोकप्रियता के सामने फौज का सबसे ताकतवर व्यक्ति भी हाल फिलहाल में नहीं टिक सकता है

प्रधानमंत्री बनने के बाद अगर इमरान खान पाकिस्तानी फौज पर चाबुक लगाने में कामयाब रहे तो वे पकिस्तान के लिए बहुत कुछ अच्छा कर सकते हैं क्योंकि वहां की फौज ने अपनी जरूरतों के लिए कई बार लोकतंत्र का गला घोंटकर सत्ता हथियाई है. सेना की पर आतंकवाद का बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं. वहां की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के साथ मिलकर सेना ने धर्म और आतंकवाद की खूब सियासत की है.
दिलचस्प ये है कि इमरान खान अपने चुनावी वादों और नारों में लोकतंत्र की ही बात करते आए हैं. और इसी लोकतंत्र की बात पर उन्हें पकिस्तान की जनता इतना बड़ा जनादेश दे रही है कि उनका कप्तान खान फौजी खान ना बन जाए.

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