मॉब लिंचिंग: साधु मरे या मजदूर, समाज बुरी तरह फेल हो रहा है

तीन दिन पहले की खबर है। महाराष्ट्र के पालघर में भीड़ ने तीन लोगों को घेरा। बुरी तरह पीटा। सूचना मिली तो पुलिस आई। पुलिस के सामने भी सैकड़ों ने तीनों को पीटा। तीनों की मौत हो गई। बताया गया कि भीड़ ने तीनों को इस शक में पीटकर मार डाला कि उसे शक भर था कि ये तीनों चोर हैं।
यह ख़बर लिखते वक्त ही मुझे भीड़ की सोच पर अफसोस हुआ। पुलिस की लाचारी पर दुख हुआ। दुख इसलिए कि हत्या होते देख भी उसे गोली चलाने की अनुमति नहीं है। या है भी तो नहीं चलाई गई। जब मैं खबर लिख रहा था, तब तक घटना के बारे में प्राथमिक जानकारी ही सामने आई थी।

मौत की खबर पर नहीं सिससता समाज

नतीजा यह रहा कि खबर पब्लिश हुई, थोड़ी बहुत पढ़ी गई। अगले दिन घटना का वीडियो टीवी पर चला। तीन लोगों की नृशंस हत्या होते देख भी सोशल मीडिया पर वह उबाल नहीं आया था। इसी सोच को मैं खतरनाक मानता हूँ। अगले दिन सूचना सामने आ गई कि मारे गए तीनों लोग चोर नहीं साधु थे। साधु जो भीख मांगकर जीवन यापन करते हैं। सामान्यतः ये किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते। खबर यह भी आई कि इलाके में चोरों के घूमने की अफवाह थी। इसलिए भीड़ ने तीनों को चोर के भेष में छुपा मान लिया।
घटना तीन दिन पहले भी नृशंस और जाहिलियत भरी थी और आज भी वही है। लेकिन अचानक से घटना के पीछे एजेंडा घुस गया।
सामान्यतः सोया रहने वाला वर्ग जाग गया। उसे अब इन तीनों की मौत का दुख होने लगा। वही दुख इनके इंसान होने पर नहीं था लेकिन साधु और भगवाधारी साधु होने पर होने लगा। इतना तब भी ठीक था। हर मौके को नफरत के रूप में भुनाने के लिए बैठी एक ब्रिगेड हाथ में मोबाइल लेकर इसके पीछे जुट गई।

मोबाइल वाली भीड़ बेहद खतरनाक है

ऐसी ही एक मोबाइल वाली भीड़ इन तीनों की मौत की जिम्मेदार है। अब बताया जा रहा है कि इन तीनों को इसलिए मार दिया गया कि ये साधु थे। बाकायदा इसके पीछे नफरती निबंध लिखकर बताया जा रहा है। ये फलां धर्म के खिलाफ फलां धर्म की साजिश है। एक तरफ से राज्य की सरकार पर उंगली उठ रही है। पुलिस को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। जाहिर तौर पर पुलिस और सरकार की जवाबदेही बनती है। लेकिन यहां दूसरा खेल शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर राज्य सरकार हो धर्म विरोधी और पुलिस को साजिशकर्ता बताया जा रहा है।
हमें यहां समझना होगा कि घटना की प्रत्यक्ष और परोक्ष जिम्मेदारी समाज की है। इसी समाज ने अफवाह फैलाई। इसी समाज ने उस अफवाह को सच मान लिया। इसी समाज ने गाड़ी पर पत्थर बरसाए। बिना कुछ सोचे-समझे इसी ने तीन निर्दोष लोगों की गाड़ी पलट दी। खूनी भीड़ को इतने पर संतोष न हुआ तो उसने तीनों को बाहर खींचकर पीटा इसी भीड़ में से कोई इसका वीडियो बनाता रहा। इसी समाज ने पुलिस की भी बात न सुनी और तीनों की जान ले ली।
अब यही समाज तीन की मौत से सबक न लेते हुए और नफरत फैला रहा है। यही समाज अभी एक-दूसरे को ललकार रहा है। इसी से उमड़ती भीड़ फिर से इंतजार में है एक अफवाह, एक मौके और कुछ निर्दोषों के इंतजार में।

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