भारत में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना इतना चुनौतीपूर्ण क्यों?

किसी भी देश के नागरिक का स्वस्थ होना बेहद जरूरी है। स्वास्थ्य हमारे जीवन के अनमोल पहलुओं में से एक है। जिस देश के नागरिक जितना स्वस्थ होगें वह उतना ही देश के विकास में अपना योगदान दें सकेंगे लेकिन जो स्थिति है वह बेहद भयावह है। कुछ साल पहले हमारे यहां हैजा, डायरिया, मलेरिया, टी.वी. आदि बीमारियों सें लोगों का मरना आम था। उस समय जब लोग चालीस साल या उससे अधिक में मरते थे तो उतना समझ नहीं आता था। भंयकर महामारी का दौर था लेकिन आज आजादी के इतने वर्षों बाद भी कुछ तस्वीर जरूर बदली है मगर स्थिति उसी के आस-पास घूम रही है।

योजना आयोग की एक रिपोर्ट है, जिसमें तीन करोड़ से अधिक लोग ग्रामीण स्तर पर बीमारियों के कारण गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। करीब दो हजार से भी ज्यादा बच्चे हमारे यहां हर दिन मामूली बीमारियों सें मर रहे हैं। जिसका उपचार प्राथमिक स्तर पर भी बेहतर ढंग से हो तो वे ठीक हो सकते हैं। इससे हम कल्पना कर सकते हैं कि हमारे यहां यह व्यवस्था कितनी कमजोर है। इसका बड़ा कारण यह है कि हमारे देश में चिकित्सा ज्यादातर प्राइवेट सेक्टर में हैं और सरकारी अस्पतालों का हाल बेहद चिंताजनक है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो इसकी स्थिति बेहद खराब है। ऐसे में लोगों को प्राइवेट स्तर पर इलाज करना पड़ता है और महंगे इलाज के चलते जो गरीब, मजदूर लोग हैं वे इलाज के लिए अपनी जमीन तक बेच देते हैं। ये तो हमारे यहां की आम घटनाएं हैं। पिछले दिनों बिहार में एक घटना हुई, जहां इलाज के लिए पैसे ना होने के चलते एक मां ने अपने बेटे तक को बेच दिया। जरा सोचिए वह पल कैसा रहा होगा, जब एक मां अपने ही हाथों अपने कलेजे के टुकड़े को महज चंद रुपये के खातिर बेच दी हो। पैसों के आगे एक मां की ममता हार गई। कितना दुखद है। केंद्र और राज्य की सरकार में भी स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने को लेकर पैसों की अलग-अलग लड़ाई है।

आज भी हमारे देश में डायरिया, मलेरिया सें मरने वाले बच्चों कि सख्यां काफी है। महंगी चिकित्सा समान रूप से जनस्वास्थ्य उपलब्ध कराने में सबसे बड़ी बाधा है। बेहतर जनस्वास्थ्य के लिए हमें सामाजिक स्तर पर भी काम करना पड़ेगा। जन जागरूकता भी बेहद जरूरी है। आर्थिक और सामाजिक विषमताओं के साथ साथ हमें सामाजिक कुरीतियों को भी समाप्त करना पड़ेगा। कुछ हद तक हमारी भी कमी है। ये सारी चीजें भी बेहतर स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार कुछ नहीं कर रही है लेकिन ये काफी नहीं है। स्वास्थ्य सिर्फ बीमारी दूर करना नहीं बल्कि एक समुचित शारीरिक, मानसिक और समाजिक खुशहाली की स्थिति है। शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक स्तर पर जब हम स्वस्थ्य नहीं होंगे। तब तक हम एक खुशहाल समाज और एक मजबूत देश की कल्पना कैसे कर सकते हैं?

इस लेखक के और लेख

बुक रिव्यू: किरदारों को वेश्या बताती ‘वेश्या: एक किरदार’

पॉलिटिकल लव: हाफ पैंट पहनकर नागपुर ना पहुंच जाना

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हमारा Youtube चैनल

पुराना चिट्ठा यहां मिलेगा

April 2026
S M T W T F S
 1234
567891011
12131415161718
19202122232425
2627282930