महिलाओं की लड़ाई पुरुषों से नहीं समाज से है

भारत में आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, और रोजगार जैसे विषयों पर महिलाओं कि स्थिति अब भी बहुत ज्यादा नहीं बदल पायी है।कुछ बदलाव जरूर देखने को मिलते हैं लेकिन ये काफी नहीं हैं। आज से कुछ दशक पहले महिलाओं पर सत्ती प्रथा, बाल विवाह ,विधवा महिलाओं के पुनर्विवाह पर रोक जैसे तरह-तरह के अत्याचार होते थे और ये अत्याचार तेजी से बढ़ भी रहे थे। इसके बढ़ने का कारण, लोगों में शिक्षा की कमी और ज्ञान का अभाव था। लेकिन उस समय अंग्रेजी शासन के दौरान राम मोहन राय, ज्योतिबा फुले, ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसे समाज सुधारकों ने महिलाओं के उत्थान के लिए संघर्ष किया।

1860 में बाल विवाह को गैर कानूनी करार दिया गया। सत्ती प्रथा को भी 1829 में अंग्रेजों ने समाप्त कर दिया। इन समाज सुधारकों के चलते महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ और इसका दूरगामी प्रभाव भी पड़ा। आजादी की लड़ाई में भी भारत की कई साहसी महिलाओं ने हिस्सा लिया। जिसमें बेगम हजरत महल, सुचेता कृपलानी, विजय लक्ष्मी पंडित, सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली समेत कई नाम शामिल हैं।  महिलाओं को लेकर भारत में पहले विश्वविद्यालय की स्थापना एन एस डीटी महिला विश्वविद्यालय के रूप में केशव कर्व के द्वारा की गई। उस समय भारत आजाद नहीं हुआ था।

1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद महिलाओं के उत्थान के लिए कई कानून बनाया गया, जिसमें 1961में भारत सरकार ने वैवाहिक व्यवस्थाओ में दहेज की मांग को अवैध करार देते हुए दहेज निषेध अधिनियम बनाया।1956 में तस्करी रोक अधिनियम पारित हुआ। 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत स्थानीय निकाय चुनावो में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी गईं। महिलाओं को लेकर सरकार आए दिन न कोई कदम उठाती रही है लेकिन फिर भी महिलाओं की स्थिति में उतना सुधार नहीं है। पहले महिलाएं सती प्रथा, बाल विवाह अदि से पीड़ित थीं और आज घरेलू हिंसा, अपराध, बलात्कार,यौन उत्पीड़न जैसी घिनौनी करतूतों से पीड़ित हैं।

क्या कहते हैं आंकड़े?

यूनिसेफ की स्टेट आफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन 2009 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 20 से 24 साल की उम्र की 47% महिलाओं की शादी 18 साल के उम्र से पहले कर दी गई। जिसमें 50%से अधिक ग्रामीण महिलाएं थीं। ये भी कहा गया कि दुनिया में अकेले 40% बाल विवाह भारत में होता है। मानव विकास रिपोर्ट 1997 के मुताबिक, 80%के लगभग 15 से 45 साल की आयु की गर्भवती महिलाएं एनिमिया से पीड़ित पाई गई थीं। साल 2015 में राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो के महिलाओं पर हुए अपराध के आंकडे़ देखने के बाद आप सहम जाएंगे कि हमारा समाज कहां खड़ा है। साल 2015 में महिलाओं पर अपराध के कुल 327394 मामले सामने आए। जिसमें उतर प्रदेश में सबसें ज्यादा 357394, पश्चिम बंगाल में 33218, महाराष्ट्र में 31126. मध्यप्रदेश में 24135 और राजस्थान में 28165 मामले पाए गए। इसमें सबसे ज्यादा घरेलू हिंसा के 113403 मामले और बलात्कार के कुल 34651 मामले दर्ज हुए हैं।

 

अब हमें जरा सोचने की जरूरत है कि आखिर हमारे समाज में महिलाओं कि स्थिति क्या है? कहां है? कितना बदलाव हुआ है? 1984 में देश की बछेंद्री पाल जैसी महिला ने माउंट एवरेस्ट पर चढ़ कर दुनियाभर में भारत का प्रतिनिधित्व किया।1997 में कल्पना चावला पहली भारतीय महिला बनीं जो अंतरिक्ष में गईं, जो ये साबित करता है कि आधी आबादी किसी से कम नहीं है। आज अगर महिलाओं की स्थिति में सुधार की बात भी होती है तो महज राजनीतिक लाभ के लिए। महिलाओं को ये बात जल्द समझ लेना चाहिए, महिलाओं के ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ महिलाओं को खुद आगे आकर अपनी लड़ाई लड़नी होगी। एक बात और, पुरुषों को भी ये बात समझ आनी चाहिए कि उनकी ये लड़ाई आपके खिलाफ नहीं हैं। उनकी लड़ाई समाज से है, उनकी लड़ाई सरकार से है और पुरुषों को महिलाओं की इस लड़ाई में बराबर का भागीदार बनना पडे़गा। तब जाकर हम बराबरी का समाज बना पाएंगे। सामाजिक, आर्थिक स्तर पर महिलाओं के जीवन में जितना बदलाव हुआ है। उससे कहीं ज्यादा और बदलने की जरूरत है।

 

इस लेख को अनिसुर रहमान ने लिखा है।

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