अटल बिहारी वाजपेयी को और कितना ‘बेचेंगे’ मोटाभाई और साहेब?

पूर्व प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े नेताओं में से एक अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद बीजेपी और नरेंद्र मोदी गुट को कुछ ज्यादा ही दुख हुआ। हालांकि, यही दुख उन्हें तब नहीं था, जब सालों से अटल बीमार पड़े थे और लगभग मृत ही थे क्योंकि न तो वह बोल पा रहे थे और ना ही कुछ समझ पा रहे थे।

अटल की मौत पर भी कई तरह के सवाल उठाए गए कि क्या सच में वह 16 अगस्त को ही मरे या फिर उनकी मौत 15 अगस्त को ही हो गई थी और इस जानकारी को छिपाया गया! हालांकि, चर्चा का विषय यह कम ही है। जिस तरह का राजकीय सम्मान अटल को दिया गया, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री के लिए उसे आसानी से जायज ठहराया जा सकता है।

 

असली मामला शुरू होता है, अटल की अस्थियों के विसर्जन को लेकर। अचानक से घोषणा होती है कि अटल की अस्थियों का विसर्जन देश की सभी प्रमुख नदियों में किया जाएगा, जिसकी बाकायदा शुरुआत हरिद्वार से होती है। बाद में चुनावी राज्यों जैसे मध्य प्रदेश और लोकसभा के लिए महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में इस राष्ट्रीय शोक का भव्य आयोजन किया गया।

कई जगहों से शोकसभा के दौरान बीजेपी नेताओं और मंत्रियों की खीस निपोरती तस्वीरें सामने आईं। यूपी के सभी जिलों की प्रमुख नदियों में अस्थि विसर्जन किया गया। कई दिनों तक शोक के नाम पर हो रहा यह आयोजन चला। मामला ठंडा पड़ता दिखा तो बेचने में एक्सपर्ट गुजराती बाबू ने ऐलान कर दिया कि अटल की स्मृति में मासिक पुण्यतिथि का आयोजन किया जाएगा। मतलब अभी अटल के नाम को और भुनाया जाएगा। ऐसे में यह भी संभव है कि बीजेपी अटल के नाम को लोकसभा चुनाव तक रटती रहे और अंत में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की तरह अटल भी कहीं किसी पन्ने में दबकर रह भर जाएं।

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