क्या गांधी के देश में विरोध का स्वरूप गांधी के विरोध की तरह है?

लोकतंत्र में विरोध होना जायज है। जब-तक जनता अपनी स्वस्थ मांगों को लेकर सरकार के सामने विरोध नहीं करेगी तब तक वह लोकतंत्र लगभग अधूरा रहेगा और जब यह विरोध ख़त्म हो जाएगा तो वह लोकतंत्र तानाशाही में परिवर्तित होने लगेगी,लेकिन प्रश्न यह है कि विरोध का स्वरुप कैसा हो??

मौजूदा समय में विरोध का स्वरुप बदल गया है। किसी भी खास संगठन द्वारा हर मुद्दे पर देशव्यापी बंद का आह्वान कर दिया जाता है। बिना लोगों की तकलीफों को समझे बंदूक और डंडे की दहशत दिखाकर बाजार के हर दुकान को बंद करवा दिया जाता है। क्या गांधी के इस देश में लोग अपनी मांगों को मनवाने के लिए गांधीजी का अनुसरण करते हैं? क्या गांधीजी ने इस प्रकार के विरोध की परिकल्पना की थी?

महात्मा गांधी ने तो भूख हड़ताल को विरोध का सबसे उचित तरीका बताया था। उनके अनुसार विरोध का मतलब दूसरे पर अत्याचार ना करके खुद को पीड़ा देना था। हुकूमत को यह दिखा देना था कि हम इस पीड़े को भी सहन कर सकते हैं। लेकिन गांधी के सत्याग्रह की इस परिभाषा का पालन जनता क्यों करे जब हमारे नेता ही अपनी सुविधानुसार उनका फायदा उठाते हैं। कोई पार्टी गांधी जी का कथित कांग्रेस मुक्त भारत के सपने को साकार करने में लगी हुई है। तो दूसरी पार्टी भर-पेट खाकर उपवास की औपचारिकता को पूरा कर रही है।

पिछले दिनों एससी/एसटी एक्ट के संशोधन के विरोध में कुछ दलित संगठनों के द्वारा भारत बंद का आह्वान हुआ था। जगह-जगह ट्रेनें रोकी गई, तो कहीं जाम की वजह से एंबुलेंस में बच्चों ने अपना दम तोड़ दिया। इस सब के बाद पुलिस चौकियों का जलना तो सामान्य बात लगने लगती है।

कुछ दिन पहले  एक फिल्म पद्मावत के विरोध में  एक खास समुदाय के लोग भारत बंद के नाम पर हिंसा करने को अमादा हो गए थे। बच्चों से भरी बसों पर पत्थर बरसाए गए थे। अब शिक्षित समाज से भरे भारत में सोशल मीडिया से भी बंद होने लगा है।

क्या यही है विश्व को शांति का संदेश देने भारत के लोगों का विरोध करने का सही तरीका??

इस सब में राजनीतिक पार्टियों की भूमिका पर क्या बात करें। वो तो इन उग्र विरोधियों को रोकने के बजाय अपने-अपने हिसाब से वोटबैंक की रोटियाँ सेंकने लगती है। किसी को दलित वोट याद आ जाता है तो कोई अपने सवर्ण वोटों को बचाने के फिराक में लग जाता है।  इस पूरे प्रक्रिया में बस उस आम जनता का प्रशासन पर से भरोसा उठ जाता है जो इस विरोध में शामिल नहीं होता है।

एक समय था जब दिल्ली स्थित जंतर मंतर विरोध प्रदर्शन का अड्डा था। हर समय में वहाँ किसी न किसी मुद्दे लोगों को लेकर विरोध किया जाता था। लेकिन आज वह जगह लोगों के शांतिपूर्वक विरोध की आहट तक सुनने के लिए व्याकुल है। बहरहाल, इन सब बातों के एवज बस एक प्रश्न का जवाब देना मुश्किल हो जाता कि क्या वाकई में वर्तमान भारत के लोग शांतिपूर्ण विरोध में विश्वास नहीं रखते या फिर हमारी हुकूमत के कानों में ही गांधीजी के तरीके से होने वाली अहिंसात्मक सत्याग्रह की आवाज नहीं पहुंचती है??

(यह लेख आशीष झा ने लोकल डिब्बा के लिए लिखा है.)

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