ये क्रिकेट बाजार की चपेट में है।

18 तारीख को युद्ध है, राष्ट्रवाद का दंगल है और बाप बेटे की लड़ाई है, यानि उस दिन भारत- पाकिस्तान का क्रिकेट मैच है। हम बेवकूफों की तरह इसे बस क्रिकेट समझेंगे। अरे कोई बात नहीं भाई हम भावुक लोग हैं। भारत जितना चाहे पाकिस्तान से खेले क्योंकि वो खेल थोड़ी न है वो तो युद्ध है। क्यों सही बोले न?

 

ये कोइ नई बात तो नहीं “नब्बे के दशक में क्रिकेट मैच के साथ ही युद्ध शुरू हो गया था। उधर ओल्ड ट्रैफर्ड के मैदान पर भारत पाकिस्तान से जीत रहा था और इधर करगिल के मोर्चे पर भारतीय फौजी खुशी से हवाई फायरिंग कर रहे थे। पाकिस्तानी सैनिक उदास थे।

भारत-पाक मैच में आप जम कर भावुक हो जाओ और इसी बीच बाज़ार चरस बो देगा और आपकी भावुकता से ऐसे खेलगा कि आप समझ नहीं पाओगे कैसे खेल गया।
जो प्लेयर खेल रहा है क्या कभी उसको ध्यान से देखा है? उसके ऊपर कितने ब्रांड लदे होते हैं, उसकी टी-शर्ट से लेकर बैट तक सब लबालब भरे हुए हैं ऐड से, क्या उसका क्रिकेट इन ब्रांड से परे होता है? क्या कभी सवाल नहीं आया कि भारत पाकिस्तान के मैच में कौन सी आफत आ जाती है कि टीवी से लेकर सब परेशान हो जाते हैं। कभी नहीं सोचा पाकिस्तान और भारत को बार-बार आमने-सामने क्यों लाया जाता है? आपको यही लगता होगा क्रिकेट पवित्र है लेकिन ऐसा कुछ नहीं है।

 

हम लोगों को खूब राष्ट्रवादी बनाया जायेगा लेकिन इस राष्ट्रवाद के पीछे जो बाजार का नंगा नाच होता है, वो न दिखता है और न कोई दिखाता है। सब फिक्स होता है कहना गलत है लेकिन सब तय होता है ये बिलकुल सच है। अगर भारत पाकिस्तान खेलेगा तो लोग टीवी देखेंगे और जोश के साथ देखेंगे, बाजार जम कर टीवी को ऐड देगा, इस बाजार का साथ मन की बात न कर के सेवक जी ने भी दे दिए हैं।

अब ये क्रिकेट बाजार की चपेट में है। क्रिकेट से ज्यादा टीवी फ्रेंडली गेम कोई नहीं हो सकता। हर छः गेंदों के बाद विज्ञापन दिखाने की सुविधा किसी और खेल से नहीं मिल सकती, मैदान पर कोई खिलाड़ी नहीं खेल रहा सिर्फ बाजार खे

अभय

अभय पॉलिटिकल साइंस के स्टूडेंट रहे हैं। वर्तमान में पॉलिटिकल लव से उनकी पहचान बन रही है। राजनीतिक और सामाजिक विषयों को ह्यूमर और इश्क के साथ पेश करना अभय की कला है।

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