Tag: हिंदी कविता

  • रात दरवाज़े पर दस्तक दे रही है

    रात दरवाज़े पर दस्तक दे रही है

    रात अब दरवाज़े पर खड़ी है रह-रह के सायरन की सदा आ रही है.

  • हर सरहद को तोड़ ही देगी आज़ादी…

    हर सरहद को तोड़ ही देगी आज़ादी दुनिया भर को घर कर देगी आज़ादी. दिल में रह-रह मौज उठेगी आज़ादी जान तो इक दिन लेके रहेगी आज़ादी. जिस्म ये आख़िर गल जाये या जल जाये रूह तो लेकर साथ चलेगी आज़ादी. तिनका तिनका ज़र्रा ज़र्रा जागेगा नींद ढलेगी शब से खुलेगी आज़ादी. चांद तकेगा तारे…

  • सब राहों के अन्वेषी बचे-खुचे जंगलों के साथ ही कट गये

    सब राहों के अन्वेषी बचे-खुचे जंगलों के साथ ही कट गये

    अब नहीं हैं प्रणययार्थी, न उनकी गणिकाऐं, वो गदिराए बदन भी नहीं हैं जिनपर लिख सको कामसूत्र जैसा ग्रंथ तुम ज्ञान के लिए यात्राएँ क्यों करोगे जब तुम्हारे हाथ में किताबें हैं जिनमें लिखे हैं यात्राओं के विवरण

  • ख़ुदकुशी…भवेश दिलशाद (शाद) की नज़्म

    ख़ुदकुशी…भवेश दिलशाद (शाद) की नज़्म

    इसी इक मोड़ पर अक्सर गिरा जाता है ऊंचाई से अपनी ज़ात और ख़ाका मिटाया जाता है सब कुछ हो जिसमें ये सिफ़अत, क़ूवत कि जो अपना सके, जो घोल पाये सब कुछ अपने में ग़मे-दिल और ग़मे जानां कहे बिन सह सके जो सब किसी इतनी बड़ी हस्ती के पहलू में किया जाता है…

  • हम फिर वापस आएंगे!

    हम फिर वापस आएंगे!

    फिर से हम जिन्दा लाशें,अपने मरे हुए सपनों से, नाउम्मीदी ओर जिल्लत की जिंदगी सेफिर से हम आपके रुके हुए शहर को चलना सिखाएंगे,फिर से आपकी जिंदगी खुशनुमां बनाएंगे.

  • शहरों से ठोकर मिला, हम चल बैठे गांव

    शहरों से ठोकर मिला, हम चल बैठे गांव

    माना अपने गांव में, रहता बहुत कलेस। कुल पीड़ा स्वीकार है, ना जाइब परदेस।

  • बुर्क़े हटा के आ गयीं, घूंघट उठा के आ गयीं, ये औरतें कमाल..

    बुर्क़े हटा के आ गयीं, घूंघट उठा के आ गयीं, ये औरतें कमाल..

    डर से निजात पा चुकीं, जीने को मरने आ चुकीं, धरने पे मुल्क ला चुकीं, ज़िद इनकी है बहाल, सलाम..

  • अग्नि वर्षा है तो है हां बर्फ़बारी है तो है

    अग्नि वर्षा है तो है हां बर्फ़बारी है तो है

    दुष्यंत चले गए. उनकी ग़ज़लें अमर हैं. जिन्होंने दुष्यंत कुमार को नहीं देखा, वे एहतराम साहब से मिल सकते हैं. एहतराम इस्लाम, हिंदी ग़ज़ल के चर्चित चेहरे हैं. देश भर लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनकी ग़ज़लें प्रकाशित हो गई हैं. ग़ज़ल में हिंदी का जैसा प्रयोग एहतराम साहब ने किया है वैसा कहीं और…

  • नहीं आना मुझे इतने बुरे संसार में अम्मा

    नहीं आना मुझे इतने बुरे संसार में अम्मा

    नज़र आता है डर ही डर, तेरे घर-बार में अम्मा नहीं आना मुझे इतने बुरे संसार में अम्मा. यहाँ तो कोई भी रिश्ता नहीं विश्वास के क़ाबिल सिसकती हैं मेरी साँसें, बहुत डरता है मेरा दिल, समझ आता नहीं ये क्या छुपा है प्यार में अम्मा नहीं आना मुझे इतने बुरे संसार में अम्मा. मुझे…

  • कविता- तुम जानती हो चुराए हुए चुम्बनों का स्वाद?

    कविता- तुम जानती हो चुराए हुए चुम्बनों का स्वाद?

    तुम्हारे कुछ चुंबन बचे हैं मेरे होठों पर कुछ मेरे भी बचे हों शायद तुम्हारे पास ये हमारे पहले चुंबन नहीं थे ये चुराये हुये थे तुम्हारे पहले प्रेमी और मेरी पहली प्रेमिका से शायद उन दोनों को चूमना नहीं आता था चुराये हुये चुंबनों का स्वाद बहुत तीखा होता है इनमें मिली होती है…