मिर्जापुर रिव्यू: ड्रामा का मसाला कुटाया थोड़ा कम है गुरु

पंकज त्रिपाठी, मनोज वाजपेई और नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे कलाकारों ने पिछले कुछ समय में अपनी ऐक्टिंग से यह पुख्ता किया है कि अगर फिल्म में ये लोग हैं तो आप ऐक्टिंग की बात को दूसरे नंबर पर रखें क्योंकि ये लोग अपने काम में चूकने वाले नहीं हैं। नई वेब सीरीज मिर्जापुर में पंकज त्रिपाठी इसी बात को कुछ और पुख्ता कर रहे हैं। राजनीति, अपराध, गुंडई, हत्या, खून-खराबा और यूपी के बैकग्राउंड के होने की वजह से बात-बात में गालियां। ये सब मिलकर पूरी सीरीज को कुछ ऐसा बनाती हैं कि आप उम्मीद करने लगते हैं कि ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से तुलना करने लगते हैं। यहीं यह सीरीज थोड़ा पीछे छूटती है।

 

फिल्म की कहानी में बॉलिवुड की किसी भी पॉलिटिकल ड्रामा या थ्रिलर फिल्म की तरह तमाम ड्रामा जैसे- धोखा, मजबूरी, अपराध, लूट-खसोट, बाहुबली, हत्या, बदले की आग, सेक्स की आग, पॉलिटिकल राइवलरी सबकुछ कूटकर भरा गया है। थोड़ी सी दिक्कत इस कूटे हुए को मिलाने में हो गई है। लंबी सीरीज के चक्कर में कई बार ऐसा होता है, जब मुख्य किरदारों में से मुन्ना त्रिपाठी (दिव्येंदु शर्मा) ही सीन में नहीं आते। खैर, यही मुन्ना त्रिपाठी को फिल्म में भी लगता है।

 

बेटा संभालने की कोशिश पंकज त्रिपाठी ने वेब सीरीज ‘गुड़गांव’ में जहां छोड़ी थी, वहीं से फिर शुरू करते हैं। गुड़गांव देखी हो तो पता चलता है कि बाप, बेटा और बाप का दुश्मन वाला ये सीन पूरा कॉपी जैसा है। स्क्रिप्ट के तौर पर करन अंशुमन और उनकी टीम की कोशिश शानदार है लेकिन अभी उन्हें तिग्मांशु धुलिया और अनुराग कश्यप से इस मामले में बहुत सीखने की जरूरत है। अंशुमन ने यूपी के मिर्जापुर को कोशिश में 80 पर्सेंट सफलता पाई है लेकिन बीच-बीच में हाथ फिसलता दिखा है। साफ लगता है कि कुछ सीन किसी और ने कुछ किसी और ने। इसका सबसे अच्छा उदाहरण आप तब पाएंगे, जब कई बार फिल्म में बेवजह गालियां आती हैं और कई बार जहां जरूरत होती है, वहां सन्नाटा रहता है।

 

बात नई पीढ़ी की
अब तक ज्यादातर कॉमिडी बेस्ड फिल्मों जैसे प्यार का पंचनामा में दिखे दिव्येंदु ने फिल्म और मिर्जापुर दोनों को अच्छे से पकड़ा है। अली फजल के साथ अभी भी स्थिति उस खिलाड़ी जैसी बनी हुई है, जो टैलेंटेड तो बहुत है लेकिन अब तक उसका असली टैलेंट दिख नहीं पा रहा। फिल्म में बबलू पंडित बने विक्रांत मासे ने काफी प्रभावित किया। रील लाइफ में भी वह काफी स्मार्ट रहे हैं और ऐक्टिंग में भी जान डाली है। लड़कियों में श्वेता त्रिपाठी, श्रेया पिलगांवकर ने भी अपना काम अच्छा निभाया है। रसिका दुग्गल ने दो-तीन सेक्स सीन्स के अलावा थोड़ी कूटनीति खेलने के काम को बखूबी अंजाम दिया है।

 

बाकी हर शुक्रवार पर्दे पर उतर रहीं बड़े बजट की फिल्मों से काफी अच्छी फिल्म है। जो पूर्वांचल में फैले अपराध और गुंडाराज की साफ तस्वीर पेश कर रही है। हां, थोड़ी शिकायत 9 एपिसोड तक खींचकर कमजोर एंडिंग देने के लिए है। दूसरी बात यह भी है कि अगर इसका दूसरा सीजन आता है तो यह शिकायत भी दूर हो सकती है।

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