विश्व टेलिविजन दिवस: बचपन में टीवी देखने किसके यहां जाते थे?

अब के बच्चों के लिए टीवी पर दर्जनों कहानियां हैं. इतनी कि वो जिन्हें चाहें देख-सुन सकते हैं, छोड़ सकते…

मिथक और इतिहास की आंख से वर्तमान को देखते थे कुंवर नारायण

कुंवर उस दौर में कलम उठाते हैं जब वैश्विक इतिहास द्वितीय विश्वयुद्ध, भारतीय स्वाधीनता संग्राम और गांधी युग जैसे उल्लेखनीय…

पॉलिटिकल भक्ति: समयानुसार “जय श्री राम”

“जय श्री राम” बड़ा ही करिश्माई नारा है| सच में इसका उच्चारण करते ही “भक्तों” की छाती पूरे 56 इन्च…

पॉलिटिकल लव: कहां लिखा है कि प्यार में चॉकलेट देना ही है?

अच्छा ये कहां लिखा है कि प्यार में चॉकलेट देना ही है! लिखा तो ये भी नहीं है दिल्ली देश…

भुख्खड़ प्यार: आओ तुम्हें बंदगोभी जैसा दिल में कैद कर लूं

जब किसी ऐसे बन्दे को प्यार हो जो बहुत खाता हो तो क्या होगा …. यार तुम मुझे अपना बना…

सबकुछ ठीक हो जाएगा बस खुद को शून्य बना लीजिए…

एक से एक इवेंट हो रहे हैं हमारे देश में, कुछ सफल हो जाते हैं और कुछ असफल। हाल ही…

कविता- तुम जानती हो चुराए हुए चुम्बनों का स्वाद?

तुम्हारे कुछ चुंबन बचे हैं मेरे होठों पर कुछ मेरे भी बचे हों शायद तुम्हारे पास ये हमारे पहले चुंबन…

प्रदूषण का ‘होम्योपैथी’ इलाज जरूरी है

अक्टूबर बीत गया अब नवंबर की शुरुआत हो चुकी है, नवंबर की शुरुआत के साथ ही दिल्ली, एनसीआर और हरियाणा-यूपी…

विद्या बालन का फिल्म प्रमोशनल नारीवाद

विद्या बालन का हालिया बयान उस समय तक एकदम सच लग रहा था, जब तक यह नहीं पता था कि…

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