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भारत में मजाक भर बनकर रह गई हैं सीबीआई जैसी संस्थाएं?

किसी भी देश या प्रदेश में कानून जरूर होता है. इसी कानून का पालन कराने के लिए सीबीआई जैसी तमाम संस्थाएं बनाई जाती हैं. कानून का उल्लंघन होने की दिशा में सजा दिलाने के लिए भी संस्थाएं बनाई जाती हैं. अपेक्षा की जाती है कि इन संस्थाओं में काम करने वाले लोग अतिरिक्त ईमानदारी बरतें. न्याय सुनिश्चित करने के लिए इन संस्थाओं की भी समाज के प्रति जिम्मेदारी बड़ी होती है. हालांकि, कुछ ही मामलों में संस्थाएं ईमानदार रह पाती हैं. इनको प्रभावित करने वाले कारकों में सरकारें, संस्थाओं के मुखिया, अधिकारियों और कर्मचारियों के निजी स्वार्थ जैसे कई कारक सामने आते हैं.

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सब को मालूम है, संस्थाएं मासूम हैं

हर कोई सीबीआई जैसी संस्थाओं को तोता ही कहता है और ऐसी संस्थाएं काम भी उसी के हिसाब से करती हैं. आलम यह है कि सीबीआई जांच को भी लोग सत्ता की मनमानी के हिसाब से देखते हैं. लोग जानते हैं कि सीबीआई या ऐसी संस्थाओं की जांच में वही आएगा, जो सरकारें चाहेंगी. सीबीआई खुद कितनी भी ईमानदारी की बात करे लेकिन सत्ता पक्ष के लोगों के खिलाफ गलती से भी किसी केस में कार्रवाई न होना ही अपने आप में इस बात को साबित करता है कि कुछ तो गड़बड़ है.

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टाइमिंग बताती है क्या हो रहा है

चुनावों से पहले नेताओं, व्यापारियों के पीछे सीबीआई-ईडी छोड़ दिया जाना, अचानक छापेमारी होना और ये सब एक वांछित अंजाम मिल जाने के बाद बंद हो जाना, दिखाता है कि सबकुछ मोटिवेटेड है. कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान इसके सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं. हाल ही में अशोक गहलोत सरकार गिराने की कोशिश में जमकर सीबीआई और अन्य संस्थाओं का इस्तेमाल हुआ.

हार मान चुकी है जनता

पिछले समय में भी सरकारें खुलेआम इन संस्थाओं का इस्तेमाल अपने हित के लिए करती रही हैं. ये उन संस्थाओं में काम करने वाले लोगों, नेताओं और आम जनता को भी बखूबी पता है. लोग सब जानते-समझते हैं लेकिन मान चुके हैं कि इनका कुछ नहीं हो सकता. फिर भी हाथरस जैसे मामलों में खीझा हुआ इंसान सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट, एसआईटी और न जाने कैसी-कैसी जांच की मांग करता है. दुर्लभ ही मामलों में ऐसा होता है कि किसी को ‘न्याय’ मिलता है. वरना पर्दे के पीछे कोई डील हो जाती है और गरीब ट्रकों के नीचे कुचला जाता है और खुद ही अपना हत्यारा साबित होता है।

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