गांधी को पूजना आसान है, उनके रास्ते पर चलना बेहद मुश्किल

भारत का एक वर्ग बिना परिस्थितियों की जटिलता और सच्चाई को समझे महात्मा गांधी को ही भारत-पाकिस्तान विभाजन का कारण मानता है और मानता रहेगा। इसी सोच का नतीजा है कि गांधी जी की हत्या कर दी गई थी। जबकि गांधी तो हमेशा नेहरू और सरदार पटेल को समझाते रहे कि विभाजन की बात मत मानो इसका नतीजा बहुत भयानक होगा लेकिन भारत का तारणहार बनने का सपना पाले इन नेताओं को गांधी जी की बात कहां समझ आती। नेहरू-पटेल और अन्य नेताओं की अनुभवहीनता सबसे पहले 1947 में आजादी के बाद ही साबित हो गई जब गांधी की कही एक-एक बात सच होने लगी।]

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कोई बापू को सुनने को तैयार नहीं था!

डोमिनिक लैपिएर और लैरी कॉलिन्स की किताब फ्रीडम ऐट मिडनाइट में ये दोनों लिखते हैं कि जिन्ना और नेहरू बड़े निश्चल थे। वे दोनों कभी इस तरह के आपसी द्वेष और कटट्टरता से भड़कने वाले झगड़ों के बारे में सोचते ही नहीं थे। उन्हें तो लगता था कि विभाजन से मात्र सीमाएं बदल जाएंगी। लेकिन गांधी को भारतीय जनता की एक-एक नब्ज पता थी इसीलिए वे हमेशा इन्हें आगाह करते रहे लेकिन उनकी सुनने को कोई तैयार ही नहीं था।

जब मई-जून 1947 में जगह-जगह पर लाइब्रेरी की किताबें, मेज-कुर्सियां, सेना के सिपाही, हथियार, अंग्रेजों की ट्रेनों और एक-एक पैसे के बंटवारे के लिए बंदरबांट चल रही थी, उसी समय महात्मा गांधी भारत के किसी गांव में लोगों को एक साथ रहना सिखा रहे थे। वे वहां उन्हें सत्य और अहिंसा का पाठ पढ़ा रहे थे। क्योंकि उनको पता था कि भारत की जनता कभी भी हिंदू-मुस्लिम-सिख में बंट जाएगी और सब सत्यानाश हो जाएगा।

महात्मा गांधी का जीवन-दर्शन है हिंद स्वराज

लुई माउंटबेटन को पता था कि विभाजन के लिए गांधी जी को मना पाना नामुमकिन है इसीलिए उसने गांधी की बजाय नेहरु और पटेल पर डोरे डाले और वह अपनी योजना में सफल भी हुआ। गांधी को अपना सबकुछ मानने वाले नेहरू और पटेल, अपने गुरु से ही दूर होते चले गए। हालांकि, उन दोनों के लिए भी यह बेहद कठिन रहा लेकिन उन्हें उनका ही रास्ता सही लगा और वे उसी पर चलते चले गए।

अकेले हो गए गांधी

बापू अकेले हो गए थे, पटेल, नेहरु और जिन्ना लगातार माउंटबेटन से मिल रहे थे। बीच-बीच में गांधी जी भी माउंटबेटन से मिलते थे लेकिन ना माउंटबेटन अपनी बात से हटने को तैयार थे ना बापू और दुर्भाग्य यह था कि गांधी के दो अनमोल रतन भी अब माउंटबेटन के साथ खड़े थे, ऐसे में गांधी के पास लाचारी के सिवा कुछ नहीं बचा था। उन्हें लगने लगा था कि कांग्रेस उनसे दूर होती जा रही है। उन्हें विश्वास नहीं हो पा रहा था कि अगर आज वे भारत की जनता को आवाज दें तो यह जनता उनके साथ खड़ी भी होगी।

एक दिन सुबह दिल्ली की सड़कों पर टहलते हुए उनके एक कार्यकर्ता ने उनसे पूछा, ‘फैसले की इस घड़ी में आपका तो कहीं जिक्र ही नहीं है, ऐसा लगता है कि आपको और आपके आदर्शों को तिलांजलि दे दी गई है।’

‘हां’ बापू ने बड़ी कटुता से जवाब दिया। उन्होंने कहा, ‘मेरी तस्वीर पर माला डालने के लिए तो सब उत्सुक हैं लेकिन मेरी सलाह कोई मानना ही नहीं चाहता।’

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