बाजार के फेफड़े तो धुंए से ही हरे होते हैं

“हवा के दोश पे उड़ती हुई ख़बर तो सुनो
हवा की बात बहुत दूर जाने वाली है”
—हसन अख्तर जलील

आज बाजार किसी भी हालात को नहीं छोड़ता, वो चाहे बारिश हो या बाढ़, आग हो या पानी बाजार अपनी जगह बना ही लेता है। दिल्ली आज दिलवालों की नहीं धुआं वालो की हो गई है और हर फेफड़ा इसी धुएं के कब्जे में है। अब सवाल उठता है कि धुआं आया कहाँ से ? क्या बाज़ार इसके पीछे भी तो नहीं? तो क्या हम ये बोल सकते है कि बाज़ार मर्ज भी बनाता है और दवा भी? ये तो एकदम ‘कृष 3’ मूवी की तरह लग रहा है, पहले विलन मर्ज बनाता था फिर खुद ही उसकी दवा बेचकर अमीर हो जाता था ।

धुआं आया कहां से?

चलिए फिर से सवाल पर आते है कि धुआं आया कहाँ से? तो आप एक बार आप दिल्ली में गाड़ियों की संख्या पर गौर करिए, यहाँ पर 1 करोड़ से ज्यादा गाड़ियां हैं जो दिल्ली में रजिस्टर्ड है बाकी हरियाणा और यूपी नंबर की गाड़ियां न जाने कितनी होंगी। धुआं इन्हीं गाड़ियों से आ रहा है और हम सिर्फ पटाखे बंद कर रहे हैं। धुआं बढ़ रहा है और अब इसी धुंए से बचने के लिए बाज़ार आपके सामने एक चमचमाता मास्क लेकर आ गया है, जिसकी कीमत 50 रुपए से लेकर हज़ार रुपए तक है लेकिन ये मास्क आपको सिर्फ बाहर ही बचा पायेगा और अगर इस धुंए से घर में भी बचना है तो ले आएं घर ड्रीम गर्ल का एयर प्यूरीफायर।

देखो बाजार का धंधा तो चोखा हो गया, आपका क्या होगा जनाबे आली। आपको तो वही धुआं रोज झेलना है। इसी पर याद आया आपको तो विकास यही वाला चाहिए था न, जिसमें खूब गाड़ियां हो और ढेर सारे फ्लाईओवर हों? तो बाजार ने तो उस हालात में भी कमाया और आज इस हालात में भी कमा रहा है, चलिए जाते-जाते एक बात बोलते हैं। विकास का बहुत शौक है ना तो अब थोड़ा सोच लीजिए बाजार का या अपना!

ख़ुश्बू को फैलने का बहुत शौक़ है मगर,
मुमकिन नहीं हवाओं से रिश्ता किए बग़ैर
—बिस्मिल सईदी

अभय

अभय पॉलिटिकल साइंस के स्टूडेंट रहे हैं। वर्तमान में पॉलिटिकल लव से उनकी पहचान बन रही है। राजनीतिक और सामाजिक विषयों को ह्यूमर और इश्क के साथ पेश करना अभय की कला है।

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