पटाखों और कोर्ट की लड़ाई से हटके एक अलग सी दिवाली!

छोटी दीपावली की सुबह जब मैं उठा तब सामने सुबह वाली चाय थी, चाय की चुस्की लेते हुए मन में कुछ बातें चल रही थी, वो बातें थी इस दीपावली को कुछ खास बनाने की। अचानक से मन में ख़्याल आया कि मेरे बहुत से मित्र दिल्ली में ज़रूरतमंदों की मदद कर रहे हैं तो क्यों ना हम भी अपने कस्बे की तरफ ऐसी ही एक मुहिम की शुरुआत करें।

बस ये ख़्याल आने भर की देर थी कि इतनी ही देर में मैंने फैसला भी कर लिया कि अब ये मुझे करना ही है, इस फैसले के बाद एक अलग ही स्तर का उत्साह था मेरे मन में। मैंने अपने मित्रों से बात की और जैसी मुझे उम्मीद थी मेरे सभी मित्रों ने इस अद्भुत कार्य के लिए हामी भर दी।

हम लोगों ने अपने जेब खर्चे से पैसे जुटा कर कुछ पैसों का इंतेज़ाम किया और बच्चों के ज़रूरत की चीज़ों को एक उपहार की तरह सजा दिया। हमें खुशियां बांटनी थी, अपनी खुशियां उन लोगों के साथ जो असमर्थ हैं अपने लिये ज़रूरत के सामान जुटा पाने में।

हम सभी मित्र दीपावली की सुबह निकल गए अपने उपहार ले कर, कम से कम 20-25 किलोमीटर दूर जाने के बाद नारायणी नदी के किनारे पर हमें एक सरकारी प्राइमरी स्कूल दिखा वहां हम रुके, चूँकि हमें बाढ़ग्रस्त इलाके के बच्चों से शुरुआत करनी थी तो सोचा यहीं हम बच्चों को उपहार भेंट करेंगे।

हमारे वहां पहुँचते ही धीरे-धीरे बच्चों की एक अच्छी खासी संख्या हमारे पास आ गयी।

उनमें से एक छोटे बच्चे ने पूछ लिया,”क्या आप लोग सरकारी हो?”

हमारे मित्र मुस्कुरा कर बोले,”नहीं! हम प्राइवेट वाले हैं।”

सारे बच्चे हँसने लगे।

माहौल इतना खुशनुमा था कि इस एहसास की यादों को हर कोई अपने साथ ले जाने को व्याकुल था।

हमने सभी बच्चों को उपहार भेंट किये और उनसे एक वादा भी लिया कि वो इन किताबों को पढ़ेंगे और कॉपियों पर लिखेंगे, चॉकलेट खायेंगे और रात को अपने-अपने घरों को रौशन भी करेंगे। ये सब कुछ हम सब के लिए एक सपने के सच होने की तरह था, मेरे सारे मित्रों में इतना उत्साह कभी-कभी ही देखने को मिलता है।

ये सब कुछ इतना मुश्किल नहीं था, बिल्कुल भी नहीं। यह कार्य कोई भी कर सकता है, बस एक शुरुआत की दरकार है। हमारी मित्र मंडली अब इस काम को आगे भी जारी रखने की पूरी कोशिश करती रहेगी। मुझे इन सब के बाद लोगों से मिल कर यह एहसास हुआ कि बहुत से लोग हैं जो ज़रूरतमंदों की मदद करना चाहते हैं लेकिन कैसे करे? कहाँ करें? बस यही सोचकर रुक जाते हैं।

हम कोई बड़े लोग नहीं हम ऐसे लोग हैं जो अपनी पढाई कर रहे हैं, कुछ नौकरी की तलाश में हैं, कुछ पापा के बिज़नेस में लगे हैं, जब हम लोगों में ये विचार पैदा हो सकता है तो और लोगों में क्यों नहीं? ये एक छोटी सी पहल हमने यही सोच के शुरू की है कि हम जैसे और भी युवा जिस भी गाँव या शहर में रहते हों ऐसा काम अपने आस-पास कर सकते हैं।

बस एक ज़ज़्बा होना चाहिए, दूसरों की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूढ़ने का। अब ये पहल रुकने वाली नहीं ये बस एक छोटी सी शुरुआत है त्योहारों को अब एक नए अंदाज़ में मनाने की।

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