धीरे-धीरे भरोसा हो रहा है कि पार्लियामेंट में डकैत ही होते हैं

इरफान खान की फिल्म सामने चल रही थी, फिल्म में डायलॉग आता है, ‘ बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत मिलते हैं पाल्लियामेंट में।’ पान […]

भक्तो! मजबूर तुम हो, बीजेपी और अमित शाह नहीं

विकल्पहीनता धीरे-धीरे निरंकुशता को जन्म देती है। भारतीय राजनीति में भी एक बार फिर से यह प्रासंगिक हो चला है। इंदिरा-संजय गांधी की जोड़ी के […]

किसान मार्च: जीते हमेशा गांधी हैं, गोडसे कभी नहीं जीत सकता

11 मार्च 2018 को प्रधानंत्री नरेंद्र मोदी संसद में बोलते हैं कि भारतीय राजनीति में सड़क के संघर्ष और धरना प्रदर्शनों की बहुत जगह नहीं […]

मूर्तियां तोड़ने/बनाने से विचारधारा खत्म/स्थापित हो जाती है?

त्रिपुरा में लेफ्ट और राइट की लड़ाई के कुछ प्रत्याशित परिणाम नजर आने लगे हैं। पहले बीजेपी नेता हेमंत बिस्व शर्मा ने त्रिपुरा के पूर्व […]

राजीव गांधी ने जो श्रीलंका में किया मोदी वही मालदीव में करेंगे?

मालदीव में सत्ता और न्यायालय के टकराव के बाद स्थिति गंभीर है। मालदीव का विपक्ष और कोर्ट भारत से मदद की उम्मीद लगाए बैठा है। […]

घर लौटना चाहता है 1857 की क्रांति का एक सिपाही

लंदन के एक पब लॉर्ड क्लायड के मालिकों ने साउथ ईस्ट एशिया के इतिहास पर काम करने वाले इतिहासकार किम वैगनर से संपर्क किया है। […]

बुक रिव्यू: किरदारों को वेश्या बताती ‘वेश्या: एक किरदार’

रिश्तों को एक-एक करके खोते जाना उस वेश्या की तरह एहसास करता है, जो लाख चाहकर भी उसी दुनिया में रहती है, जिसमें वह नारकीय […]

बुक रिव्यू: मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है

किताब का नाम: मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है लेखिका: प्रियंका ओम प्रकाशक: रेडग्रैब बुक्स मूल्य:175 रुपये यह किताब 5 कहानियों का संकलन है। जिसमें […]

तो क्या केजरीवाल ने इस बार रही-सही उम्मीद भी तोड़ दी?

मैं खुद आम आदमी पार्टी को उसके जन्म से जानता हूं, समझता हूं और काफी हद तक सहानुभूति रखता ‘था’। जी हां, रखता था। यह […]