बुक रिव्यू: मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है

किताब का नाम: मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है

लेखिका: प्रियंका ओम

प्रकाशक: रेडग्रैब बुक्स

मूल्य:175 रुपये

यह किताब 5 कहानियों का संकलन है। जिसमें से पहली कहानी अगर थोड़ी और बड़ी होती तो शायद वह एक उपन्यास हो जाता। किताब शुरू करने से पहले प्रियंका के बारे में मैं कोई राय नहीं बना पाया था, जिसका फायदा मुझे यह हुआ कि इस किताब को मैं बिना किसी पूर्वाग्रह से पढ़ सका। आजकल नई वाली हिंदी के दौर में प्रियंका की भाषा-शैली ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया। नई वाली हिंदी में कई बार जानबूझकर अंग्रेजी के संवाद घुसाए जाते हैं जो कि एक बेचैनी से भरते हैं। प्रियंका की इस किताब की भाषा सुकून देती है। कहानियों से पहले ही भाषा सबसे ज्यादा असरदार है। बहुत ज्यादा साहित्यिक भी नहीं और कहीं से हल्की भी नहीं। भाषा के लिए तो प्रियंका को पूरे नंबर मिलने चाहिए।

दूसरा नंबर पर मैं स्टोरीटेलिंग की बात करूंगा। स्टोरीटेलिंग में भी प्रियंका एक मंझी हुई लेखिका की तरह लिखती हैं। मुझे इसका सबसे मजबूत कारण यह लगा कि प्रियंका ने किताब नहीं बल्कि सच लिखने की कोशिश की है। काफी हद तक प्रियंका इस क्षेत्र में भी प्रभावित करती हैं। देश-विदेश के किस्सों में घूमती कहानियां कहीं से भी आपको बोर तो कर ही नहीं सकती हैं। हां, 5 कहानियां होने की वजह से हर कहानी के बाद थोड़े समय के लिए कहीं खो जाने का मन जरूर करता है।

पहली कहानी ‘प्रेम पत्र’ स्कूली जीवन में होने वाले पहले प्यार, गुरूर, जलन, दोस्ती और बेहतरीन लेखन का शानदार मिश्रण है। कहानी कहीं गुदगुदाती है, कहीं इश्क याद दिलाती है, कहीं दोस्तों को याद करके रुलाती है तो कहीं एक मीठी सी याद के साथ चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान दे जाती है।

दूसरी कहानी ‘और मैं आगे बढ़ गई’ कुछ यूं लिखी गई है कि आपको लगने लगे कि यह कहानी लेखिका की ही है, बस नाम बदले गए हैं। जबकि यह कहानी सबकी है। स्त्री को गुलाम समझने वालों को आईना दिखाने वाली एक बेहतरीन कहानी है यह।

तीसरी कहानी, ‘मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है’ काफी फिलॉसॉफिकल और कुछ ज्यादा ही गंभीर हो जाती है। कहीं-कहीं कहानी थोड़ा सा कनफ्यूज भी करती है लेकिन कहानी को पूरा पढ़े जाने तक आप मेरी राय से ताल्लुक ना ही रखें तो बेहतर हो।

दरअसल मुझे लगता है कि ‘लास्ट कॉफी’ जो कि चौथी कहानी है को किताब की आखिरी कहानी होना चाहिए। इस कहानी को पढ़ने के बाद मन कहीं खोने सा लगता है। कल्पना के पंक्षी पिंजरा तोड़ने लगते हैं। मन करता है कि खो जाऊं किसी कॉफी हाउस में और ढूंढ लूं किसी ऐसे अजनबी को जो कुछ कहानियां दे जाए। जिन्हें ना लिखा जाए ना पढ़ा जाए, बस जिया जाए।

जैसा कि मैंने कहा कि लास्ट कॉफी को ही आखिरी कहानी होना चाहिए। इसलिए मैं आखिरी कहानी के बारे में कुछ नहीं लिख रहा। ये लेखिका के लिए एक संदेश है कि वह समझ जाएं कि आखिरी कहानी की जरूरत क्यों नहीं थी।

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