पुस्तक समीक्षा: ज़िंदगी को चाहिए नमक

तो…नमक का मतलब यहां ज़ाइक़ा है..

किताब का नाम- ज़िंदगी को चाहिए नामक

विचार विमर्श किया जा सकता है, राय-मशवरा दिया जा सकता है, रज़ा-नाराज़गी जताई जा सकती है, लेकिन पहले… दुल्हन जब घर आ जाये तो फिर यह सब बेमानी है. दुल्हन घर आ जाये तो उसका स्वागत करना होता है, उसके नैन-नक़्श में ख़ामियां नहीं देखी जातीं, बल्कि मुंहदिखायी का नेग दिया जाता है. किताब के साथ भी ऐसा ही है. किताब हाथ में आ जाये तो प्रतिक्रिया के रूप में नेग देना चाहिए, न कि वो बातें करना चाहिए, जिनका समय न हो. लेकिन हां, बड़े होने के नाते नेग, भविष्य की शुभकामनाओं के साथ ही कुछ वो इशारे ज़रूर देने चाहिए जो बेहतर भविष्य के लिए आवश्यक और महत्वपूर्ण हों.

हिमानी की किताब ‘ज़िंदगी को चाहिए नमक’ इस समय में एक अनोखा प्रतीक बनकर आती है. 2020 — वक्त़ की किताब का वो पन्ना, जिसमें नमक ‘अश्रु, स्वेद और रक्त’ रूप में हर तरफ अवसाद का कारण दिखा, तब हिमानी की किताब का नमक ‘प्यार, लगाव, रोमांस और राग-अनुराग’ रूप में एक ज़ाइक़ा लेकर आता है. इस ज़ाइक़े को कैसे समझा और समझाया जा सकता है?

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हिमानी की किताब रिश्तों के छोटे-छोटे, लेकिन स्मरणीय पलों का बही खाता है. इनमें एहसासों की रिदा पर बिछे शब्द काफ़ी हद तक पाठक को स्मृतियों में ले जा सकते हैं. ख़ास बात यह है कि हिमानी ने इन यादों में किरदारों के नाम नहीं चुने हैं. तपन सिन्हा की कलात्मक फ़िल्म ‘आदमी और औरत’ की तरकीब पर इस किताब में ‘लड़की और लड़का’, इन दो किरदारों के माध्यम से यादें और पल साझा किये गये हैं. इससे होता यह है कि पाठक इनके साथ अपनी पहचान, अपना राब्ता आसानी से क़ायम कर पाता है.

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दूसरी ख़ास बात यह है कि इन लघु प्रसंगों को रोचक, आम तौर की और आसान भाषा, शैली में परोसा गया है, ताकि ज़ुबान पर रखते ही पूरा निवाला घुल जाये, ज़्यादा चबाना न पड़े. फ्रांसिस बेकन ने अपने एक यादगार निबंध में लिखा था – “कुछ किताबें चखने, कुछ चबाने और कुछ पूरी तरह निगल जाने के लिए होती हैं”. हिमानी की किताब ज़ाइक़े की किताब है, चखने और चबाने के बीच की.

इस किताब की परंपरा क्या है? कुछ ही बरस पहले वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी की एक किताब ‘तमन्ना तुम अब कहां हो’ शीर्षक से शाया हुई थी, जिसमें क़िस्सानुमा कुछ प्रसंग/यादें/ख़याल… नज़्म थे. ज़ाहिर है हिमानी की किताब इस शृंखला में है, लेकिन इस परंपरा में नहीं. चर्चित पत्रकार रवीश कुमार की भी एक किताब ‘इश्क़ में शहर होना’ उन्वान से शाया हुई, जिसे ‘लप्रेक’ यानी लघु प्रेम कथा संग्रह के तौर पर प्रचारित किया गया. हिमानी की यह किताब बेशक इस परंपरा में है, लेकिन इसका मिज़ाज अलग है.

यह ‘अलग होना’ महत्वपूर्ण है. हिमानी की इस किताब में तकरीबन हर शीर्षक के भीतर एक लड़की और एक लड़का है. फिर भी, लड़की ज़्यादा है, काफ़ी ज़्यादा. इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह नहीं है कि इसे ‘फेमिनिज़्म’ से जोड़कर देखा जाये. हिमानी की किताब की यह लड़की ज़्यादातर जगहों पर एक पारंपरिक लड़की है, बागी नहीं. समाज इस ‘Next Door Girl’ को आसानी से पहचान सकता है. इस किताब का बाना न तो वैचारिक है, न दार्शनिक और न कलात्मक. इस किताब की बुनाई संवेदनाओं और (सटीक शब्दों में कहा जाये तो) गुदगुदाने और बुदबुदाने वाली स्मृतियों से उठती लहरों से हुई है.

सामाजिक संघर्षों की धुंधली सी परछाइयां कहीं मिल जायें, लेकिन यह किताब उन रिश्तों की खोज करती है, जो समय के साथ द्वंद्वों के बीच ‘क्या खोया क्या पाया’ के प्रश्नोत्तर रूप में चलते रहते हैं. यह किताब कहानियां नहीं कहती, मन की बात करती है. प्रतिरोध, विमर्श जैसी आलोचकीय परिधि से इतर यह किताब ‘संवाद प्रधान’ है. यूं नहीं कि ‘अंदाज़े-क़िस्सागोई’ बातचीत शैली या संवादों के ज़रीये ज़्यादा है, बल्कि यूं कि एक शीर्षक जिस बयान के बाद ख़त्म होता है, उसके बाद भी कई जगह एक संवाद की गुंजाइश बची रहती है. नयी उम्र के पनपते मन की नज़र से यह इस किताब की ख़ूबी है.

यह किताब अस्ल में वो नमक है, जिसे आप स्वादानुसार अपने मन में मिला सकते हैं या मिला हुआ पा सकते हैं. ऐसा है क्योंकि कहीं पाठक को लगेगा कि इस प्रसंग पर किसी फिल्मी दृश्य या किसी शॉर्ट फिल्म की गुंजाइश है, तो कहीं कोई प्रसंग पहले किसी परदे पर देखा हुआ सा लग सकता है. यानी हिमानी के ये इंदराज बिम्ब प्रधान हैं. इनमें प्रतीक कहीं मिल जायें, रूपक मुश्किल हैं. इन IMAGERIES की रेखांकनीय बात है कि यहां विडंबना या विरोधाभास से काम लेने की रूढ़िगत शैली (कई बार सस्ती स्टंटबाज़ी) से बचा गया है.

लेखिका के बारे में

‘जिंदगी को चाहिए नमक’ किसी साहित्यकार नहीं, एक युवा पत्रकार के क़लम से निकली अनुभूतियों का संग्रह है. राहत की बात है कि एक पत्रकार के तौर पर मशीनी, कई बार बेमानी शब्दों के साथ दिन गुज़ार देने के शग़ल के बीच हिमानी के भीतर एक उथल-पुथल और खलबली है. बाक़ी है. शुभकामना है कि बरक़रार रहे. हर किताब अपनी एक यात्रा करती है और हर किताब का लेखक भी… ये बेचैनी ही हिमानी की यात्रा में एक अर्थ पैदा करे, शुभकामना.

किताब — ज़िंदगी को चाहिए नमक
लेखक — हिमानी
समीक्षा/समालोचना — भवेश दिलशाद

(ग़ज़ल के समृद्ध हस्ताक्षर भवेश दिलशाद, पेशे से पत्रकार हैं. देश में अदब की दुनिया के बेहद चर्चित शायरों में से एक.)

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