भारतेंदु हरिश्चंद्रः आधुनिक हिंदी के पितामह

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परिवर्तन गुजरते समय के अगले पदचिह्न के पर्याय भी होते हैं और एक लंबी यात्रा का एक पड़ाव भी। पड़ाव वह जहां से यात्रा नए कलेवर में, नई ऊर्जा के साथ एक नया स्वरूप लेकर आगे बढ़ती है। इस परिवर्तन को तब केवल परिवर्तन नहीं कहा जाता। तब इसे युगांतर, क्रांति या नए मार्ग का प्रवर्तन आदि संबोधनों से संबोधित किया जाता है।

हर प्रवर्तन या क्रांति अपनी स्थापना के लिए एक स्थापक ढूंढती है। एक युगपुरूष, जो केवल उस महान परिवर्तन का माध्यम बनने के लिए हमारे बीच आता है और नए मार्ग का सृजन कर उससे विश्व को आगे बढ़ने की प्रेरणा देकर चला जाता है। 9 सितंबर एक ऐसे ही महान प्रवर्तक के प्राकट्य की ऐतिहासिक तारीख है। अपने जमाने के लोकप्रिय कवि गिरिधरदास यानी कि गोपालचंद्र एक संपन्न परिवार से ताल्लुक रखते थे। कई पीढ़ियों से इस परिवार की संपन्नता अक्षुण्ण थी। अंग्रेजी राज से अच्छे संबंध भी इनकी संपन्नता के कारणों में गिने जा सकते हैं। इसी संपन्न वैश्य परिवार में 1850 ईसवी में भारतेंदु का जन्म हुआ। भारतेंदु हरिश्चंद्र, हिंदी साहित्य से परिचित कोई भी ऐसा नहीं होगा जिससे इस नाम का परिचय अब तक न हुआ हो।

परिवार के धार्मिक और साहित्यिक वातावरण में हिंदी साहित्य का एक ऐसा वटवृक्ष पल रहा था जिसकी छांव में आने वाले कई दशकों, सदियों तक हिंदी का एक विशाल कुनबा प्रश्रय पाने वाले था। जन्म के महज सात साल बाद या सीधे-सीधे कहें तो महज सात वर्ष की उम्र में कवि पिता गिरिधरदास को बालक हरिश्चंद्र ने एक दोहा सुनाया, जो उन्होंने खुद लिखा था। दोहा था-

“लै ब्यौढ़ा ठाणे भए, श्री अनिरुद्ध सुजान।
बाणासुर की सेन को, हनन लगे भगवान।।”

मात्रा, भाषा. छंद विधान और भाव का संतुलन दोहे में देख पिता गदगद हो गए। बेटे को महान कवि बनने का आशीर्वाद दिया, और यही आशीर्वाद हिंदी साहित्य के मार्ग में एक नया मोड़ बनने का आधार साबित हुआ। भारतेंदु ने अपनी पहली कविता ब्रज भाषा में लिखी। उस दौर में आधुनिक हिंदी वाली कविताएं नहीं लिखी जाती थीं। साहित्य में ब्रज और अवधी का पूरी तरह से कब्जा था। भारतेंदु ने हिंदी साहित्य में खड़ी बोली भाषा का सृजन किया। खड़ी बोली हिंदी वह हिंदी थी जो ऊर्दू से काफी अलग थी। यह हिंदी उस दौर की तमाम क्षेत्रीय भाषाओं से पोषण पाती थी। हरिश्चंद्र का संपूर्ण गद्य साहित्य खड़ी हिंदी बोली ही में लिखा गया है। हां, कविता के लिए उन्होंने ब्रजभाषा को ही माध्यम बनाया हुआ था। भारतेंदु को हिंदी साहित्य का वटवृक्ष इसलिए भी कहा जा सकता है, क्योंकि हिंदी साहित्य की दुनिया में उपन्यास, निबंध, नाटक आदि की शाखाएं उन्हीं से निकलीं। साहित्य की इन विधाओं का न केवल विकास बल्कि उनका प्रचार-प्रसार भी भारतेंदु की ही उपलब्धि थी।

पंद्रह वर्ष की अवस्था से ही रचनाकर्म शुरू कर देने वाले हरिश्चंद्र अपने छोटे से जीवनकाल में साहित्य का वो उपयोगी भंडार दुनिया को सौंप गए जिसकी नींव पर आज हिंदी साहित्य अपना परचम पूरी दुनिया में लहरा पाने में कामयाब है। कविता, कहानी, नाटक, व्यंग्य, ग़ज़ल और निबंध, साहित्य की कौन सी ऐसी विधा है जिस पर भारतेंदु की कलम न चली। साहित्यकार एक तरह से समाजसुधारक की भी भूमिका में होता है। भारतेंदु की रचनाओं ने उस दैर में व्याप्त तमाम सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों पर प्रहार करने के लिए कलम को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की परंपरा का सूत्रपात किया। अंधेर नगरी नाटक के जरिए एक दिक्भ्रमित और भ्रष्ट शासक के राज्य में लोगों की दुर्दशा को जिस बेहतरीन अंदाज में प्रस्तुत किया गया है, उसके बारे में क्या ही कहा जाए। अंग्रेजी राज को आधार बनाकर लिखे गए इस चुटीले व्यंग्य को आज की परिस्थिति की कसौटी पर भी रखा जाए तो भी यह खरा ही दिखता है –

अंधेर नगरी अनबूझ राजा। टका सेर भाजी टका सेर खाजा॥
नीच ऊँच सब एकहि ऐसे। जैसे भड़ुए पंडित तैसे॥
वेश्या जोरू एक समाना। बकरी गऊ एक करि जाना॥
सांचे मारे मारे डाल। छली दुष्ट सिर चढ़ि चढ़ि बोलैं॥
प्रगट सभ्य अन्तर छलहारी। सोइ राजसभा बलभारी ॥
सांच कहैं ते पनही खावैं। झूठे बहुविधि पदवी पावै ॥
धर्म अधर्म एक दरसाई। राजा करै सो न्याव सदाई ॥
भीतर स्वाहा बाहर सादे। राज करहिं अमले अरु प्यादे ॥
अंधाधुंध मच्यौ सब देसा। मानहुँ राजा रहत बिदेसा ॥
गो द्विज श्रुति आदर नहिं होई। मानहुँ नृपति बिधर्मी कोई ॥
ऊँच नीच सब एकहि सारा। मानहुँ ब्रह्म ज्ञान बिस्तारा ॥
अंधेर नगरी अनबूझ राजा। टका सेर भाजी टका सेर खाजा ॥

राष्ट्रभक्ति भारतेंदु में कूट-कूट कर भरी थी। वे आत्मसम्मान और स्वाभिमान के लिए न्यौछावर हो जाने वाले व्यक्तित्व थे। अपने देश, देश के लोगों और देश की भाषा से उन्हे अथाह प्रेम था। तभी तो अपने देश की दुर्दशा को लेकर जहां ‘भारत दुर्दशा’ जैसा कालजयी नाटक लिखते हैं वहीं ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ जैसे विषय पर निबंध लिखते हुए देश की ऐसी कड़वी हकीकत की नब्ज पर उंगली रखते हैं जो आज के दौर में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि तब थी। ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है’ में भारतेंदु लिखते हैं कि –

“हमारे हिंदुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी है। यद्यपि फर्स्ट क्लास, सैकेंड क्लास आदि गाड़ी बहुत अच्छी-अच्छी और बड़े-बड़े महसूल की इस ट्रेन में लगी है पर बिना इंजिन सब नहीं चल सकती वैसी ही हिंदुस्तानी लोगों को कोई चलाने वाला हो तो ये क्या नहीं कर सकते। इनसे इतना कह दीजिए ‘का चुप साधि रहा बलवाना’ फिर देखिए हनुमानजी को अपना बल कैसा याद आता है।”

भारतेंदु ने अपने देश से जुड़ी चीजों की उन्नति पर बड़ा जोर दिया है। वो इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक मानते हैं। अपने एक बहुचर्चित दोहे में उन्होंने लिखा भी है-

“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निजभाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को शूल।”

भारतेंदु रचनात्मकता के अक्षय स्रोत थे। अंग्रेजी राज से लोहा लेने के लिए उन्होंने जिस तरह से अपनी रचनात्मकता का सहारा लिया वह उनकी दूरदर्शी सोच का द्योतक है। उन्होंने ही पत्रकारिता में हास्य व्यंग्य विधा की शुरूआत की थी। ये उनका अपने तरह का स्वतंत्रता संग्राम था। भारतेंदु के साहित्यकोश में कई तरह की गजलें और हास्य गजलें भी सम्मिलित हैं। श्रीकृष्ण की भक्ति करतीं उनकी गजल की ये कुछ पंक्तियां देखिए –

“जहाँ देखो वहाँ मौजूद मेरा कृष्ण प्यारा है,
उसी का सब है जल्वा जो जहाँ में आश्कारा है। 
जो कुछ कहते हैं हम यही भी तिरा जल्वा है इक वर्ना, 
किसे ताक़त जो मुँह खोले यहाँ हर शख़्स हारा है ।।”

भारतेंदु का साहित्यकोश बहुत ही विस्तृत है। सभी का जिक्र करना बेहद मुश्किल है। महज 35 साल तक जीने वाले भारतेंदु की तकरीबन 150 रचनाएं प्रकाशित हुई हैं। साहित्य में उनका योगदान केवल लिखने तक ही सीमित नहीं रहा है। उन्होंने महज 18 साल की उम्र में ‘कविवचनसुधा’ नाम की एक पत्रिका का संपादन भी किया। इसमें उस दौर के मशहूर रचनाकारों की रचनाएं छपती थीं। इसके अलावा उन्होंने ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ का भी संपादन किया। हिंदी साहित्य में भारतेंदु काल प्राचीनता और नवीनता का संधिकाल है। यहां से जहां प्राचीनता नए स्वरूप में ढलने की कोशिश कर रही थी वहीं कई तरह की नवीनताओं ने भी अपनी यात्रा की शुरूआत की थी। इन नवीनताओं के प्रवर्तक निस्संदेह भारतेंदु थे। अपने दौर में उनकी लोकप्रियता ने उन्हें ‘भारतेंदु’ का संबोधन दिया तो वहीं एक अपरिमित काल वाली परंपरा में उनके योगदान ने उन्हें युगपुरूष के तौर पर स्थापित कर दिया। हिंदी साहित्य का भारतेंदु काल एक युगांतकारी घटना के तौर पर देखा जाता है। जहां से आधुनिक हिंदी ने चलना सीखा, जिसे तब खड़ी हिंदी कहा जाता था और आज जो हिंदी का पर्याय है।

भारतेंदु के व्यक्तिगत जीवन की कटुता ने कभी उनके सामाजिक, साहित्यिक और राष्ट्रीय दायित्वों को प्रभावित नहीं किया। बेहद कम आयु में पिता को खो देने वाले भारतेंदु ने स्वाध्याय के बलबूते हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया था। इन सबके इतर भारतेंदु का सामाजिक व्यवहार भी काफी तरल था। करूणा और दानशीलता उनके नसों में लहू की तरह प्रवाहित होता था। अपनी इन्हीं प्रवृत्तियों की वजह से उनके जीवन का आखिरी दौर काफी तकलीफों से भरा हुआ था। क्षय रोग की पीड़ा उनसे बर्दाश्त नहीं हुई, और 1850 में पैदा हुआ हिंदी माता का यह अनन्य पुत्र सन् 1885 में महज 35 वर्ष की आयु में स्वर्गवासी हो गया।

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