कौन है ‘धनमस्त’ बीसीसीआई से बिहार का हक छीनने वाला शख्स?

आज से सत्रह बरस पहले भारत के सबसे प्राचीन वैभवशाली साम्राज्य मगध के एक हिस्से और आधुनिक बिहार का विभाजन किया गया था और एक नया राज्य झारखंड अस्तित्व में आया था। इन दोनों राज्यों के बीच लगे ‘सीमा समाप्ति’ के बोर्ड ने बिहार के घरेलू क्रिकेटरों की क्रिकेटीय आकांक्षा के पर कुतर दिए थे।

दरअसल, क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार का ऑफिस जमशेदपुर था, साथ ही झारखंड के हिस्से में ही अंतर्राष्ट्रीय कीनन स्टेडियम आया था जबकि बिहार के भूगोल में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का स्टेडियम नहीं था। इन समस्याओं से इतर बिहार में क्रिकेट की प्रशासकीय समस्या खड़ी हो गयी थी। जैसे एक मज़बूत राजा के अभाव में छोटे-छोटे सामंत राजा बन जाते है। वैसे ही बिहार में समानांतर तौर पर तीन क्रिकेट एसोसिएशन; एसोसिएशन ऑफ बिहार क्रिकेट(एबीसी), बिहार क्रिकेट एसोसिएशन(बीसीए)और क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार(कैब) बन गए। ये तीनों ही संगठन अपने को वास्तविक मानते थे।

ख़ुद को अगुआ साबित करने की संगठनों की ये चिल्लम-चिल्ला जब बीसीसीआई के कानों में पहुँची तो उन्होंने इन संगठनों की मान्यता रद्द करते हुए बिहार को वर्ष 2005 से रणजी ट्राफी, ईरानी ट्राफी सहित अन्य राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंटों में खेलने से प्रतिबंधित कर दिया। इसके बाद बिहार के खिलाड़ियों की हालत खानाबदोशों जैसी हो गयी। कोई बंगाल से खेलने लगा, कोई झारखंड से तो कोई यूपी से खेलने लगा।

यहां तक की भारत के सर्वकालिक सफलतम कप्तान महेंद्र सिंह धोनी जिन्होंने अपना पहला मैच बिहार रणजी टीम के बैनर तले ही खेला था, उनके भविष्य पर भी संकट के बादल मंडरा रहे थे। मगर उनकी पैदाइश रांची की थी और चूंकि बोर्ड का ऑफिस रांची था, साथ ही झारखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन को भी बीसीसीआई ने मान्यता दी थी, तो उनका आगे का क्रिकेटीय भविष्य सुरक्षित हो गया। मगर बिहार के खिलाड़ियों के लिए विकट मुसीबत खड़ी हो गयी थी।

वर्ष 2010 के बाद से अब तक कोर्ट ने इस पर सोलह बार सुनवाई की है। क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार को बचाने में जिस एक शख़्स ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई है, वह हैं बोर्ड के महासचिव आदित्य वर्मा। वह लगातार बिहार क्रिकेट को उसका हक़ दिलाने के वास्ते लड़ते रहे। बीसीसीआई के मुम्बई दफ्तर के बाहर उन्होंने डेरा ही डाल रखा था। उनके पास सिर्फ कुछेक कागज होते थे और उन्हीं कागजों के सहारे उन्होंने दफ़्तर के कुछ लोगों से दोस्ती भी साध ली थी, जो उन्हें कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखने में भी काम आई।

चूंकि इस मामले में एक पक्षकार बीसीसीआई जैसा हाथी भर का धन कुबेर संगठन था, जो आर्थिक रूप से आदित्य वर्मा से हज़ारों गुना बलवान था। साथ ही पैसे की कमी से आदित्य बाबू मानसिक तनाव से भी गुजर रहे थे। केस को लड़ने की ख़ातिर आदित्य वर्मा ने अपने बीवी के गहने तक गिरवी रख दिये थे।

आख़िर में कोर्ट ने ‘क्रिकेट की ख़ातिर’ बिहार एसोसिएशन ऑफ क्रिकेट का दर्जा बहाल करते हुए उसे सभी राष्ट्रीय टूर्नामेंट जैसे रणजी ट्राफी, चैलेंजर ट्रॉफी और ईरानी ट्रॉफी में खेलने की इजाज़त दे दी है।  कोर्ट ने कहा कि वो बिना किसी याचिका या बहस किये स्वतः ये निर्णय दे रही है कि बिहार को क्रिकेट खेलना चाहिए। इस एक निर्णय के साथ ही भारत की तीसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाले राज्य बिहार के क्रिकेटरों को अपने खेल की खातिर लिए गए आत्म निर्वासन से भी मुक्ति मिल जाएगी, साथ ही बिहार में प्रशासकीय मदद के बग़ैर मर चुका क्रिकेट फ़िर से जीं उठेगा।


यह लेख संकर्षण शुक्ल ने लिखा है।

sankarshanshukla

मैं जीवन को अभी समझ ही रहा हूँ..........

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